हल्द्वानी: महिला हिंसा के खिलाफ प्रगतिशील महिला एकता केंद्र का सेमिनार, महिलाओं पर बढ़ते हमलों पर गंभीर चिंता
हल्द्वानी, 30 नवंबर 2025। समाज में लगातार बढ़ रही महिला हिंसा के खिलाफ प्रगतिशील महिला एकता केंद्र द्वारा रविवार को सत्यनारायण मीटिंग हॉल में एक महत्वपूर्ण सेमिनार आयोजित किया गया। कार्यक्रम में महिला उत्पीड़न, लैंगिक असमानता और सामाजिक-राजनीतिक कारणों से बढ़ रही हिंसा के विभिन्न आयामों पर विस्तार से चर्चा हुई।
कार्यक्रम की शुरुआत समाज में बराबरी की लड़ाई लड़ते हुए मारी गई महिलाओं को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए दो मिनट के मौन से हुई। इसके बाद ‘कारवां चलता रहेगा…’ गीत ने पूरे हॉल में संवेदना और संघर्ष की भावना को और मजबूत किया।
सेमिनार पत्र रखते हुए प्रगतिशील महिला एकता केंद्र की महासचिव रजनी जोशी ने कहा कि 25 नवंबर को पूरी दुनिया महिला हिंसा उन्मूलन दिवस मनाती है, लेकिन जमीनी हकीकत बेहद भयावह है। “पूरी दुनिया में हर तीसरी महिला किसी न किसी रूप में हिंसा की शिकार है। यह आंकड़ा बताता है कि सरकारों के दावे खोखले हैं और वास्तविकता इससे बिल्कुल विपरीत है।”
परिवर्तनकामी छात्र संगठन की कार्यकारिणी सदस्य विजेयता ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 25 नवंबर को महिला हिंसा उन्मूलन दिवस नारीवादी आंदोलनों के लंबे संघर्ष के बाद घोषित किया। उन्होंने कहा, “मिरावल बहनों की हत्या तानाशाह के विरोध के कारण हुई थी, इसे महिला हिंसा से जोड़कर शासक वर्ग द्वारा अपनी क्रूरता को छुपाने की कोशिश की गई।”
इंकलाबी मजदूर केन्द्र की पिंकी गंगवार ने कहा कि महिलाओं के प्रति हिंसा रोकने के नाम पर सरकारें रस्मी कानून बनाकर अपना पल्ला झाड़ लेती हैं। “हर बड़ी घटना के बाद नया कानून बना, परंतु हिंसा का ग्राफ लगातार बढ़ता जा रहा है।”
वक्ताओं ने कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2024 रिपोर्ट के अनुसार हर तीन में से एक महिला अपने जीवन में शारीरिक या यौनिक हिंसा झेलती है। पूंजीवादी उपभोक्तावादी संस्कृति और उसके कारण उत्पन्न सामाजिक संकट महिलाओं के खिलाफ हिंसा को और भयावह बना रहे हैं।
प्रगतिशील भोजनमाता संगठन की अध्यक्ष शारदा ने कहा कि उत्तराखंड के गठन के 25 वर्ष पूरे होने पर रजत जयंती मनाने के बावजूद राज्य में महिला अपराध लगातार बढ़ रहे हैं। “नारी को शक्ति का स्वरूप माना जाता है, लेकिन पितृसत्तात्मक सोच और उपभोक्तावादी संस्कृति आज महिलाओं की सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती है।”
वक्ताओं ने कहा कि आज भी महिलाओं को दोयम दर्जे का जीवन जीना पड़ रहा है। कार्यस्थलों पर अब भी उन्हें पुरुषों से कम वेतन मिलता है। “पिछले 100 सालों के संघर्ष से हासिल अधिकार आज संघी सरकार छीनने की कोशिश कर रही है। महिलाओं को घरों में कैद कर उन्हें सिर्फ बच्चा पैदा करने की मशीन बनाने की साजिश की जा रही है।”
क्रालोस के केंद्रीय अध्यक्ष प्रेम प्रसाद आर्या ने कहा कि आज देश में यौन हिंसा लगातार बढ़ रही है। “घर हो, दफ्तर हो या बाजार—कहीं भी महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं। पूंजीवादी व्यवस्था मुनाफे के लिए महिला शरीर को उपभोग की वस्तु बनाकर पेश कर रही है, जिससे हिंसा बढ़ रही है।”
उत्तराखंड महिला मंच की बसंती पाठक ने कहा कि महिलाएं घरेलू गुलामी, धार्मिक-पिछड़ी मान्यताओं और पूंजी की गुलामी से जकड़ी हुई हैं। “जब तक महिलाएं इन गुलामियों से मुक्त नहीं होंगी, तब तक हिंसा खत्म नहीं होगी। इसके लिए महिलाओं को मजबूत संगठन बनाने होंगे।”
कई संगठनों की सक्रिय मौजूदगी
सेमिनार में प्रगतिशील महिला एकता केंद्र के अलावा इंकलाबी मजदूर केन्द्र, परिवर्तनकामी छात्र संगठन, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, एक्टू, आशा वर्कर यूनियन, उत्तराखंड महिला मंच, प्रगतिशील भोजनमाता संगठन, ठेका मजदूर कल्याण समिति, भीम आर्मी, उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी सहित कई संगठनों के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।
इनकी रही उपस्थिति
बिंदू गुप्ता, रजनी जोशी, बसंती पाठक, महेश चन्द्र, टी.आर. पाण्डेय, मोहन, मुकेश भंडारी, आरती गुप्ता, हेमा देवी, भावना गोस्वामी, हिमानी अगरिया, पी.पी. आर्या, चंपा देवी, हेमा भट्ट, पिंकी गंगवार, शीला शर्मा, विजेयता, पी.सी. तिवारी, कमला पाण्डेय, पुष्पा, उमेश, अनुराग, नीता, तुलसी छीमवाल, विपिन, कविता, प्रिया कुमारी, शोभा, पूजा, दीपा बवारी, रितु, मंजू, कमला कुंजवाल, शारदा, रजनी सहित दर्जनों लोग शामिल हुए।
