उत्तराखंड अलग राज्य बने वर्षों बाद भी पतलचौरा गांव सड़क से वंचित, ग्रामीण आज भी डोली के सहारे मजबूर
अल्मोड़ा। उत्तराखंड को अलग राज्य बने लंबा समय बीत चुका है, लेकिन आज भी जिले के कई गांव बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। ऐसा ही एक उदाहरण विकासखंड भैंसियाछाना का पतलचौरा गांव है, जहां आज तक सड़क नहीं पहुंच पाई है।
भैंसियाछाना विकासखंड के कनारीछीना-बिनूक-पतलचौरा मोटर मार्ग का लगभग पांच किलोमीटर हिस्सा पिछले छह वर्षों से अधर में लटका हुआ है। वर्ष 2020 में तत्कालीन विधायक रघुनाथ चौहान के अथक प्रयासों से इस सड़क को स्वीकृति मिली थी। इसके बाद सर्वे, अर्थ टेस्टिंग और वन विभाग से एनओसी जैसी सभी औपचारिकताएं पूरी हो चुकी हैं, इसके बावजूद सड़क निर्माण कार्य आज तक शुरू नहीं हो पाया।
इस सड़क मार्ग के अंतर्गत पतलचौरा और चिमचुवा समेत चार-पांच गांव आते हैं, जो अनुसूचित जाति बहुल गांव हैं। प्रदेश सरकार अनुसूचित जाति के गांवों के विकास और सुविधाओं को लेकर बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोल रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि आज भी उन्हें दो किलोमीटर चढ़ाई और दो किलोमीटर ढलान पार कर मरीजों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं को डोली के सहारे कनारीछीना तक ले जाना पड़ता है। विडंबना यह है कि कनारीछीना के एलोपैथिक अस्पताल में स्थायी डॉक्टर की तैनाती नहीं है, अस्पताल केवल एक फार्मासिस्ट के भरोसे चल रहा है।
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता प्रताप सिंह नेगी ने बताया कि रीठागाड़ क्षेत्र की छह-सात ग्राम पंचायतें आज भी सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित हैं। उन्होंने कहा कि सड़क और स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव के कारण इन पंचायतों के ग्रामीणों का पलायन तेज़ी से बढ़ रहा है।
ग्रामीणों ने सरकार से जल्द से जल्द सड़क निर्माण कार्य शुरू करने और क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाएं मजबूत करने की मांग की है, ताकि पहाड़ से हो रहे पलायन पर रोक लगाई जा सके।
