जहां इंसान नहीं, पेड़ों की गूंजी शहनाई! अल्मोड़ा में पीपल बना दूल्हा, वट बनी दुल्हन, ढोल-दमाऊं संग हुई अनोखी शादी
अल्मोड़ा। उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में एक ऐसी शादी हुई, जिसने हर किसी को चौंका दिया। यहां न दूल्हा इंसान था, न दुल्हन… फिर भी वैदिक मंत्र, मंगलगीत, बैंड-बाजा, डीजे, नाच-गाना और पूरी बारात मौजूद थी। मौका था पीपल और वट (बरगद) वृक्ष के पवित्र विवाह का, जो पूरे रीति-रिवाज और सनातन परंपरा के साथ संपन्न हुआ।
ढोल-दमाऊं की थाप, डीजे की धुन और आतिशबाजी के बीच बारातियों ने जमकर नृत्य किया। गांव की गलियों में ऐसा नज़ारा था मानो किसी बड़े घराने की शादी हो रही हो। महिलाएं झोड़ा गा रही थीं, छोलिया नृत्य की धूम मची थी और हर कोई इस अद्भुत पल का गवाह बनने को उत्साहित दिखा।
यह अनोखी शादी लमगड़ा विकासखंड के ग्राम पंचायत सैनोली में हुई। खास बात यह रही कि वर्ष 2011 में लोक पर्व हरेला के दिन प्राथमिक विद्यालय सैनोली की शिक्षिका कला बिष्ट ने पीपल और वट के पौधे रोपे थे। 15 साल बाद, जब दोनों वृक्ष पूर्ण विकसित हो गए, तो गांववालों ने उन्हें दूल्हा-दुल्हन बनाकर विवाह करा दिया।
पीपल के पेड़ को दूल्हे की तरह सजाया गया और वट वृक्ष को दुल्हन का रूप दिया गया।बहादुर सिंह और चंपा देवी ने कन्यादान किया, जबकि वर पक्ष की ओर से पान सिंह और शांति देवी बारात लेकर पहुंचे। पुरोहित देवी दत्त जोशी और गिरीश चंद्र जोशी ने मंत्रोच्चार के बीच फेरे कराए।
शादी से पहले हल्दी-मेहंदी की रस्म निभाई गई। जयमाला के समय वर-वधु बने पेड़ों पर फूलों की वर्षा हुई। समधी मिलन समारोह भी ठीक वैसे ही हुआ, जैसे किसी मानवीय विवाह में होता है।
शादी समारोह में पूड़ी, चावल, रायता सहित कई पारंपरिक व्यंजन बनाए गए। मेहमानों का स्वागत पूरे सम्मान और उल्लास के साथ किया गया।
इस विवाह में चौकुना, सिल्पड़, भाबू, नौगांव, दाड़िमी, सीम, बरम, मझाऊं, थामथोली, खड़ियानौली, बाराकोट, बिरखम और पुभाऊं सहित कई गांवों से बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। विधायक समेत कई गणमान्य लोगों को भी निमंत्रण भेजा गया था।
क्षेत्र पंचायत सदस्य राजेंद्र सिंह धानक ने बताया कि पीपल (विष्णु-ब्रह्मा प्रतीक) और वट (शिव प्रतीक) का यह विवाह हरिशंकरी विवाह कहलाता है। मान्यता है कि इससे सुख-समृद्धि, लंबी आयु और संतान सुख की प्राप्ति होती है।
शिक्षिका कला बिष्ट ने कहा कि यह परंपरा लोगों को पेड़ों से जोड़ने और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देती है। आज जिस तेजी से वृक्षों का कटान हो रहा है, ऐसे आयोजनों से समाज को जागरूक करना बेहद जरूरी है।
यह विवाह केवल परंपरा नहीं, बल्कि धरती को हरा-भरा रखने का संकल्प था — जिसने साबित कर दिया कि जब आस्था और पर्यावरण साथ चलते हैं, तो उत्सव भी संदेश बन जाता है।

