
देवभूमि जन हुंकार, हल्द्वानी (नैनीताल): उत्तराखंड के हल्द्वानी जिला न्यायालय से महत्वपूर्ण फैसला सामने आया है।हल्द्वानी की अदालत ने अपहरण, दुष्कर्म, आपराधिक धमकी और धर्मांतरण से जुड़े एक मामले की सुनवाई पूरी करते हुए आरोपी को सभी आरोपों से दोषमुक्त (Acquitted) कर दिया है। इस मामले में बचाव पक्ष की ओर से विद्वान अधिवक्ता लोकेश राज चौधरी और रविन्द्र सिंह द्वारा की गई प्रभावी विधिक पैरवी बेहद निर्णायक साबित हुई।
क्या था पूरा मामला और कब दर्ज हुई थी FIR?
प्राप्त विधिक विवरण के अनुसार, यह पूरा घटनाक्रम जुलाई 2023 का है। थाना काठगोदाम क्षेत्र निवासी एक व्यक्ति ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी कि उसके पड़ोसी ने पुरानी रंजिश का बदला लेने के लिए उसकी नाबालिक बेटी को बहला-फुसलाकर अपने साथ भगा लिया है। इस शिकायत के आधार पर पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया था।
तपश्चात्, थाना पुलिस काठगोदाम द्वारा दिनांक 29-8-2023 को न्यायालय में आरोप पत्र (चार्जशीट) दाखिल किया गया। पुलिस ने इस मामले में निम्नलिखित गंभीर धाराओं के तहत चार्जशीट लगाई थी:
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भारतीय दंड संहिता की धारा 363, 366, 376(2)(द), 506
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उत्तराखंड धर्म स्वतंत्रता अधिनियम की धारा 3(1) व 5(1)
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लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो एक्ट) की धारा 5/6
इस कानूनी प्रक्रिया के दौरान अभियुक्त को कुल 11 महीने 14 दिन जेल में बिताने पड़े, जिसके पश्चात उसे माननीय उच्च न्यायालय (High Court) से जमानत (Bell) प्राप्त हुई थी।
अधिवक्ता लोकेश राज चौधरी की मजबूत दलीलें और कोर्ट का निष्कर्ष
मुकदमे के ट्रायल के दौरान अदालत में अभियोजन और बचाव पक्ष के बीच लंबी कानूनी बहस और गवाहों के परीक्षण की प्रक्रिया चली। अभियुक्त की ओर से अदालत में पैरवी कर रहे विद्वान अधिवक्ता लोकेश राज चौधरी ने पत्रावली पर मौजूद साक्ष्यों, गवाहों के बयानों और विरोधाभासों को अत्यंत बारीकी से न्यायालय के समक्ष रखा।
विशेष न्यायाधीश पॉक्सो ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और पत्रावली का गहन अवलोकन करने के बाद अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष अभियुक्त के विरुद्ध लगाए गए अपहरण, दुष्कर्म, धमकी, पॉक्सो और धर्म परिवर्तन के आरोपों को ‘युक्तियुक्त संदेह से परे’ (Beyond Reasonable Doubt) साबित करने में पूरी तरह असफल रहा है।
अदालत ने अपने आदेश में संक्षेप में यह भी उल्लेख किया कि गवाहों के बयानों में वह विश्वसनीयता और सुसंगतता नहीं थी जो इन गंभीर अपराधों को प्रमाणित कर सके।
न्यायालय का अंतिम आदेश
अदालत ने विशेष सत्र में फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि अभियुक्त को उसके विरुद्ध आरोपित सभी दण्डनीय अपराधों से दोषमुक्त किया जाता है। चूंकि अभियुक्त पूर्व में जमानत पर था, इसलिए अदालत ने उसके जमानत पत्र एवं बंधपत्र निरस्त कर जमानतियों को उनके जमानत के दायित्व से उन्मोचित (Discharged) कर दिया है। माल मुकदमाती और अन्य विधिक औपचारिकताएं नियमानुसार पूरी करने के निर्देश दिए गए हैं।
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