Uttarakhand Legal Concept Representing High Court Verdict On Student Union Reservation
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देवभूमि जन हुंकार, नैनीताल / देहरादून: उत्तराखंड के शिक्षण संस्थानों और छात्र राजनीति से जुड़ी इस वक्त की सबसे बड़ी कानूनी खबर सामने आ रही है। उत्तराखंड उच्च न्यायालय (High Court) ने राज्य सरकार द्वारा विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों के छात्रसंघ चुनावों (Students’ Union Elections) में लागू किए गए 50 प्रतिशत आरक्षण के नीतिगत निर्णय को पूरी तरह वैध ठहराया है। इसके साथ ही, इस निर्णय को चुनौती देने वाली तमाम रिट याचिकाओं को अदालत ने खारिज कर दिया है।

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यह महत्वपूर्ण फैसला न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी की एकलपीठ द्वारा सुनाया गया है। अदालत में यह याचिकाएं रामनगर और हल्द्वानी के विभिन्न डिग्री कॉलेजों के छात्र नेताओं— भरत केशवानी, मानस आर्य सहित अन्य उम्मीदवारों की ओर से दायर की गई थीं।

याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ताओं का मुख्य तर्क यह था कि राज्य सरकार के पास छात्रसंघ चुनावों के आंतरिक मामलों में आरक्षण का प्रतिशत या नियम तय करने का विधिक अधिकार नहीं है, और इसलिए सरकार द्वारा जारी किया गया संबंधित शासनादेश (Government Order) असंवैधानिक है जिसे तुरंत निरस्त किया जाना चाहिए।

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मामले की गंभीरता को देखते हुए सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से स्वयं महाधिवक्ता एस.एन. बाबुलकर (S.N. Babulkar) ने अदालत के समक्ष सरकार का पक्ष रखा। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान के प्रावधानों के तहत राज्य सरकार को समाज के सभी वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व देने और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण नीति तय करने की असीमित एवं वैध शक्ति प्राप्त है। महाधिवक्ता ने तर्क दिया कि छात्रों द्वारा दायर की गई यह याचिकाएं कानूनी रूप से पोषणीय नहीं हैं और इन्हें खारिज किया जाना चाहिए।

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उच्च न्यायालय ने दोनों पक्षों के वकीलों की लंबी और विस्तृत दलीलें सुनने के बाद पत्रावली का बारीकी से अध्ययन किया। अदालत ने पाया कि सरकार का शासनादेश पूरी तरह विधिक दायरे में है और संविधान प्रदत्त शक्तियों के अनुरूप है।

इसके साथ ही, उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार के निर्णय को सही मानते हुए तमाम याचिकाएं खारिज कर दीं। इस ऐतिहासिक फैसले के बाद अब यह स्पष्ट हो गया है कि उत्तराखंड के सभी महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में आगामी छात्रसंघ चुनाव तयशुदा 50 प्रतिशत आरक्षण के प्रावधानों के आधार पर ही आयोजित किए जाएंगे। उच्च न्यायालय के इस फैसले को सरकार और सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण से एक बड़ी जीत माना जा रहा है।


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