हल्द्वानी। हल्द्वानी में नाबालिग के कथित शोषण और पीछा कर परेशान करने से जुड़े एक मामले में अदालत ने अभियुक्त को दोषमुक्त कर दिया। अभियुक्त की ओर से अधिवक्ता लोकेश राज चौधरी ने पैरवी की। न्यायालय ने पीड़िता के बयानों में विरोधाभास और अभियोजन पक्ष के आरोपों का युक्तियुक्त संदेह से परे साबित न हो पाने को फैसले का आधार बनाया।
क्या था पूरा मामला?
प्राप्त विवरण के अनुसार, 22 फरवरी 2025 को पीड़िता के भाई ने हल्द्वानी कोतवाली में लिखित तहरीर दी थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि अभियुक्त ने अपनी पहचान छिपाकर करीब तीन साल तक उसकी नाबालिग बहन का शारीरिक शोषण किया। शिकायत के मुताबिक, पीड़िता को अभियुक्त के धर्म के बारे में जानकारी होने के बाद उसने उससे बातचीत बंद कर दी, जिसके बाद अभियुक्त पर जान से मारने की धमकी देने का आरोप लगाया गया।
तहरीर के आधार पर पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 376 और 506, पॉक्सो अधिनियम की धारा 5/6 तथा उत्तराखंड धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम की धारा 3/4 के तहत मुकदमा दर्ज किया था। उपलब्ध विवरण के अनुसार, अभियुक्त करीब दो महीने नौ दिन तक हल्द्वानी जेल में निरुद्ध रहा।
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मामले की विवेचना के दौरान मेडिकल परीक्षण में कोई निष्कर्ष सामने नहीं आने और पीड़िता के बयानों में स्थिरता नहीं रहने के आधार पर गंभीर आरोपों से संबंधित धाराओं को हटा दिया गया। इसके बाद पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 354-डी और पॉक्सो अधिनियम की धारा 11/12 के तहत न्यायालय में आरोपपत्र पेश किया।
मुकदमे की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से छह गवाह पेश किए गए।
न्यायालय में दिए गए बयानों के अनुसार, पीड़िता ने बताया कि वह अभियुक्त के साथ अपनी मर्जी से ब्लॉग बनाती थी। उसने यह भी कहा कि ब्लॉग का नाम ‘Shahid UK04’ था और वह शुरू से इस नाम से परिचित थी।
पीड़िता ने अपने बयान में घटना वाले दिन अभियुक्त की बाइक चलाने और सीपीयू कर्मियों द्वारा रोके जाने का जिक्र किया। उसके अनुसार, वह उस समय डर गई थी और इसी डर के कारण उसने अभियुक्त के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई थी। पीड़िता ने यह भी कहा कि अभियुक्त ने उसे जान से मारने की धमकी नहीं दी थी।
वहीं, पीड़िता के भाई ने न्यायालय में बताया कि उन्हें हीरानगर चौकी बुलाया गया था और पुलिसकर्मियों ने उनसे तहरीर लिखकर देने को कहा था।
न्यायालय ने पीड़िता के मुख्य परीक्षण और प्रतिपरीक्षण में सामने आए बयानों का अवलोकन किया। फैसले में कहा गया कि पीड़िता ने दोनों चरणों में घटनाक्रम के संबंध में पूरी तरह अलग और विरोधाभासी बयान दिए।
न्यायालय के निष्कर्ष के अनुसार, इन विरोधाभासों के चलते अभियुक्त पर पीड़िता का पीछा करने और उसे परेशान करने से संबंधित आरोप संदिग्ध हो गए। पीड़िता के विरोधाभासी और असंपुष्ट बयानों के आधार पर अभियुक्त के विरुद्ध लगाए गए आरोप युक्तियुक्त संदेह से परे साबित नहीं हुए।
इसी आधार पर न्यायालय ने अभियुक्त को दोषमुक्त कर दिया।
महत्वपूर्ण: दोषमुक्त किए जाने का अर्थ है कि इस मुकदमे में अभियोजन पक्ष आरोपों को आवश्यक कानूनी मानक के अनुसार साबित नहीं कर पाया। यह खबर उपलब्ध कराए गए मामले के विवरण पर आधारित है।
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