देवभूमि जन हुंकार, अल्मोड़ा / देहरादून: देवभूमि उत्तराखंड की पहचान यहाँ के ऊंचे पहाड़ों, कल-कल बहती नदियों और लहलहाते हरे-भरे खेतों से जुड़ी रही है। लेकिन समय के साथ पर्वतीय क्षेत्रों की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि संस्कृति गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। जनपद अल्मोड़ा समेत उत्तराखंड के तमाम पर्वतीय क्षेत्रों से कृषि के पतन को लेकर बेहद चिंताजनक और विचारणीय तथ्य सामने आ रहे हैं। स्थानीय किसानों और ग्रामीण चिंतकों का कहना है कि पहाड़ों में अब लोगों ने धीरे-धीरे खेती-पाती करना काफी हद तक कम कर दिया है, जिसके पीछे सरकारी नीतियों, विशेषकर मुफ्त राशन योजना और लगातार हो रहे पलायन को प्रमुख कारण माना जा रहा है।
फ्री राशन के चलते युवा वर्ग में बढ़ा आलस, 15-20 साल पहले लहलहाते थे खेत
स्थानीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था का विश्लेषण करते हुए जानकारों का कहना है कि सरकार द्वारा अल्मोड़ा समेत सभी पर्वतीय क्षेत्रों में जो करोड़ों रुपये का राशन मुफ्त में वितरित किया जा रहा है, उसके दूरगामी परिणाम ग्रामीण समाज पर दिखने लगे हैं। मुफ्त राशन मिलने के बाद से पर्वतीय क्षेत्रों के युवाओं ने पारंपरिक खेती और शारीरिक मेहनत से दूरी बनानी शुरू कर दी है, जिससे युवा वर्ग में एक तरह की निष्क्रियता या आलस घर कर गया है।
आज से बमुश्किल 15 से 20 साल पहले उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों की तस्वीर बिल्कुल अलग हुआ करती थी। तब पर्वतीय क्षेत्रों में खेती-पाती, साग-सब्जी, पारंपरिक अनाज और ताजे फलों का बहुत अच्छा और शुद्ध उत्पादन होता था। हर गांव के सीढ़ीदार खेत (Terraced Farms) हर-भरे और आजीविका का मुख्य साधन हुआ करते थे। लेकिन जब से मुफ्त राशन की संस्कृति ने पैर पसारे हैं, तब से लोगों की दैनिक दिनचर्या से खेती और बागवानी पूरी तरह गायब होने लगी है और कृषि उत्पादन में भारी गिरावट दर्ज की गई है।
प्रताप सिंह नेगी का बड़ा बयान— “फ्री राशन के पैसों से पहाड़ों में स्थापित किए जाएं उद्योग और रोजगार”
इस गंभीर मुद्दे पर अपनी बात रखते हुए स्थानीय निवासी प्रताप सिंह नेगी ने तीखा सवाल उठाया है। उन्होंने कहा, “अगर करोड़ों रुपये के इस फ्री राशन की जगह पर स्थानीय रोजगार और कोई उद्योग-धंधा लगाने में यही पैसा खर्च किया जाता, तो एक तरफ हमारे युवा-युवतियों को पहाड़ में ही रोजगार का सुनहरा अवसर मिलता।”
उन्होंने आगे कहा कि जो लोग अपनी उपजाऊ खेती बंजर छोड़कर फ्री के राशन और पलायन के कारण पहाड़ छोड़ने को मजबूर हैं, वे यदि रोजगार पा जाते तो दोबारा पहाड़ों में खेती-बाड़ी शुरू कर देते। इससे एक बार फिर पहाड़ों के वीरान पड़े खेत-खलिहान खिल उठते और पलायन की रफ्तार पर भी काफी हद तक लगाम लगती।
खेत वीरान होने से बढ़ा बंदरों और जंगली जानवरों का आतंक, उठी पुनरुद्धार की मांग
पहाड़ों में कृषि पतन का एक और बड़ा दुष्परिणाम वन्यजीवों और इंसानों के बीच बढ़ते संघर्ष के रूप में सामने आ रहा है। प्रताप सिंह नेगी ने बताया कि आज पहाड़ों में जंगली जानवरों और बंदरों का जो भीषण आतंक मचा हुआ है, उसका सबसे मुख्य कारण भी खेती का बंद होना है। जब कोई व्यक्ति खेत में फसल उगाएगा ही नहीं, तो भूखे जंगली जानवर और बंदर बंजर जंगलों से निकलकर बस्तियों और बची-कुची फसलों का रुख करेंगे ही। यदि पहाड़ों के स्थानीय लोगों को वहीं रोजगार और आजीविका मिल जाए, तो न तो खेत बंजर होंगे और न ही जंगली जानवरों का यह बेकाबू आतंक बढ़ेगा।
प्रताप सिंह नेगी के माध्यम से उत्तराखंड सरकार से यह पुरजोर मांग की गई है कि यदि सरकार करोड़ों रुपये की लागत से मुफ्त राशन बांट रही है, तो उसी करोड़ों रुपये की लागत से पहाड़ों में रोजगार सृजन और कृषि संवर्द्धन की ठोस मुहिम चलाई जाए। यदि पर्वतीय क्षेत्रों में धीरे-धीरे ही सही, लेकिन खेती-किसानी फिर से शुरू हो जाती है, तो आज से 15-20 साल पहले जैसी शांत, खुशहाल और समृद्ध आबोहवा थी, वैसा ही उत्तराखंड एक बार फिर से बन सकता है।
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