आशाओं को न्यूनतम वेतन व दर्जा नहीं, उल्टे कार्रवाई के आदेश पर भड़का गुस्सा
प्रदेश अध्यक्ष कमला कुंजवाल बोलीं – सरकार अपनी जिम्मेदारी से भाग रही है, आंदोलन को होंगी बाध्य
✍ संवाददाता – सीमा खेतवाल
देहरादून। उत्तराखण्ड आशा हेल्थ वर्कर्स यूनियन (ऐक्टू से संबद्ध) की प्रदेश अध्यक्ष कमला कुंजवाल ने सरकार और स्वास्थ्य विभाग पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि एक ओर आशा कार्यकर्ताओं को न्यूनतम वेतन, कर्मचारी का दर्जा और सम्मान तक नहीं दिया जा रहा, वहीं दूसरी ओर उन पर काम का बोझ लगातार बढ़ाया जा रहा है।
कमला कुंजवाल ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि आशा वर्कर्स को विभाग के सभी सर्वे और अभियानों में बिना वेतन के झोंक दिया जाता है। गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं की सेवा से लेकर स्वास्थ्य अभियानों तक, हर जिम्मेदारी आशाओं पर डाल दी गई है। बावजूद इसके सरकार उन्हें वादा किया गया पैसा तक समय पर नहीं देती। कई बार छह-छह माह तक भुगतान नहीं होता, जिससे आशाओं को आर्थिक संकट झेलना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि ट्रेनिंग के दौरान दिया जाने वाला पैसा इतना कम होता है कि दूर-दराज से आने वाली आशाएं अपना किराया-भाड़ा तक नहीं निकाल पातीं। वहीं सरकारी अस्पतालों में आशाओं को अक्सर अपमानजनक व्यवहार और प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है।
प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि अस्पतालों में डॉक्टर और जांच की सुविधाएं उपलब्ध न होने के कारण कई बार गर्भवती महिलाओं को निजी अस्पतालों में भर्ती कराना पड़ता है। लेकिन सरकार और स्वास्थ्य विभाग अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाय आशाओं पर ही कार्रवाई के आदेश जारी कर रहे हैं, जो पूरी तरह अन्यायपूर्ण है।
कमला कुंजवाल ने चेतावनी दी कि यदि इस तरह के आदेश वापस नहीं लिए गए तो यूनियन आंदोलन को बाध्य होगी।
मुख्य मांगे
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सभी सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की तत्काल नियुक्ति की जाए।
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गर्भवती महिलाओं के लिए अल्ट्रासाउंड व अन्य जांच सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।
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गर्भवती महिलाओं और शिशुओं के लिए आवश्यक दवाइयों व विटामिन की कमी दूर की जाए।
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आशा वर्कर्स को न्यूनतम वेतन और कर्मचारी का दर्जा दिया जाए।
