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BREAKING NEWS: RTI का खेल पड़ा भारी, सरकारी कर्मचारी पर गिरी गाज!

हल्द्वानी/नैनीताल | सूचना का अधिकार (RTI) पारदर्शिता के लिए है, लेकिन जब एक सरकारी मुलाजिम ही अपने दफ्तर को ‘फर्जी’ काम में उलझा दे, तो एक्शन तो बनता है। नैनीताल के जिलाधिकारी ललित मोहन रयाल ने एक ऐसा ही कड़ा फैसला लेते हुए व्यवस्था को कड़ा संदेश दिया है।

क्या है पूरा मामला?

जिलाधिकारी कार्यालय में तैनात प्रधान सहायक मोहम्मद अकरम ने अपने ही विभाग के विभिन्न पटलों (Sections) से इतनी जानकारी मांग ली कि पूरा दफ्तर उसे जुटाने में लग गया। जब 3000 पन्नों का पुलिंदा तैयार हुआ, तो साहब ने उसे लेने से ही मना कर दिया।

आज तक की पड़ताल: कैसे हुआ संसाधनों का ‘मर्डर’?

मेहनत बेकार: सीमित स्टाफ होने के बावजूद कर्मचारियों ने दिन-रात एक कर 3000 पन्नों का डेटा जुटाया।

मुफ्त की चोट: सूचना का अधिकार के तहत ये जानकारी नि:शुल्क तैयार की गई थी।

वजह गायब: जब जानकारी तैयार हो गई, तो अकरम ने बिना किसी ठोस कारण के उसे रिसीव करने से इनकार कर दिया।

कामकाज ठप: इस पूरी प्रक्रिया में सरकारी मशीनरी का समय, श्रम और कीमती संसाधनों की भारी बर्बादी हुई।

DM का हंटर: ‘लोक सेवक से संयम की उम्मीद’

जिलाधिकारी ललित मोहन रयाल ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए आदेश जारी किया है। आदेश की मुख्य बातें:

सुप्रीम कोर्ट का हवाला: आरटीआई का मकसद जवाबदेही है, सरकारी तंत्र को बाधित करना या संसाधनों का दुरुपयोग करना नहीं।

आचरण नियमावली का उल्लंघन: एक सरकारी कर्मचारी से सामान्य नागरिक के मुकाबले अधिक जिम्मेदार व्यवहार की अपेक्षा की जाती है। अकरम का यह कदम उत्तराखंड सरकारी सेवक आचरण नियमावली के खिलाफ पाया गया।

बड़ी कार्रवाई: भर्त्सना, चेतावनी और तबादला

प्रशासन ने मोहम्मद अकरम को केवल चेतावनी देकर नहीं छोड़ा है, बल्कि उन पर कड़ा प्रहार किया है:

औपचारिक भर्त्सना: अकरम के खिलाफ विभागीय स्तर पर आधिकारिक ‘भर्त्सना’ दर्ज की गई है।

कड़ी चेतावनी: भविष्य में विधिक मर्यादाओं में रहने की हिदायत दी गई है।

तबादला: प्रशासनिक आधार पर उनका जिला मुख्यालय से तत्काल प्रभाव से ट्रांसफर कर दिया गया है।

बड़ी बात: यह कार्रवाई उन लोगों के लिए नजीर है जो सूचना के अधिकार का इस्तेमाल निजी खुन्नस निकालने या व्यवस्था को परेशान करने के लिए करते हैं।


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