सबूतों की परख में अधिवक्ता की जीत
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मजबूत पैरवी का असर: अधिवक्ता की दलीलों से 8 साल पुराना केस ढह गया

सबूतों की परख में अधिवक्ता की जीत, आरोपी को कोर्ट से मिली बड़ी राहत

नैनीताल। गाली-गलौच, जान से मारने की धमकी और घर में तोड़फोड़ जैसे गंभीर आरोपों से जुड़ा मामला आखिरकार अदालत में टिक नहीं पाया। नैनीताल जिले के लालकुआं क्षेत्र से जुड़े वर्ष 2018 के एक आपराधिक प्रकरण में न्यायालय ने आरोपी विजय पाल को सभी आरोपों से बरी कर दिया है।

न्यायालय ने IPC की धारा 427, 504 और 506 के तहत दर्ज मुकदमे में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह असफल रहा। कोर्ट ने कहा कि केवल आरोपों और अनुमानों के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

शिकायतकर्ता की ओर से आरोप लगाया गया था कि आरोपी विजय पाल ने निर्माणाधीन मकान में तोड़फोड़ की, गाली-गलौच की और जान से मारने की धमकी दी। इन्हीं आरोपों के आधार पर वर्ष 2018 में लालकुआं थाने में FIR दर्ज की गई थी।

सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयान आपस में मेल नहीं खाते। कुछ गवाहों ने खुद को घटना के समय मौके पर मौजूद नहीं बताया, जबकि अन्य बयानों में गंभीर विरोधाभास सामने आए, जिससे पूरा अभियोजन कमजोर पड़ गया।

कोर्ट ने यह भी माना कि FIR में न तो कथित गाली-गलौच के शब्दों का स्पष्ट उल्लेख किया गया था और न ही तोड़फोड़ व धमकी से संबंधित कोई ठोस भौतिक साक्ष्य पेश किया गया।

अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि हर गाली-गलौच अपने आप में IPC की धारा 504 के अंतर्गत अपराध नहीं होती। इसके लिए यह साबित होना जरूरी है कि उससे सार्वजनिक शांति भंग होने की वास्तविक संभावना थी।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि शक चाहे कितना भी गहरा हो, वह सबूत की जगह नहीं ले सकता। यदि मामले में दो संभावित निष्कर्ष निकलते हैं, तो कानून आरोपी के पक्ष में जाने वाले निष्कर्ष को प्राथमिकता देता है।

मामले में आरोपी की ओर से पैरवी कर रहे बचाव पक्ष के अधिवक्ता अधिवक्ता गोविन्द सिंह डंगवाल व सहायक अधिवक्ता योगेन्द्र कुमार पाठक , कोमल जायसवाल ने अदालत के समक्ष तर्क रखा कि पूरे केस की नींव ही कमजोर साक्ष्यों और विरोधाभासी बयानों पर टिकी है। उन्होंने गवाहों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष कोई ऐसा ठोस प्रमाण पेश नहीं कर सका, जिससे आरोपी पर लगे आरोप कानूनन सिद्ध हो सकें।
अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट के कई अहम फैसलों का हवाला देते हुए अदालत को बताया कि आपराधिक मामलों में दोष सिद्ध करने का मानक बेहद कठोर होता है, जिसे इस प्रकरण में पूरा नहीं किया गया।

इस मामले में वर्ष 2018 में FIR दर्ज हुई, 2023 में आरोप तय किए गए और फरवरी 2026 में अदालत ने अंतिम फैसला सुनाया। करीब 8 साल तक चली न्यायिक प्रक्रिया के बाद आरोपी को न्यायिक राहत मिली।

सभी आरोपों से बरी होने के बाद विजय पाल को अदालत से बड़ी राहत मिली है। कोर्ट ने साफ कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में नाकाम रहा।


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