कत्यूरी वंशजों ने रानीबाग स्थित चित्रेश्वर धाम
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‘जय जिया रानी’ के जयकारों से गूंजा चित्रेश्वर धाम, कुमाऊं–गढ़वाल से उमड़े कत्यूरी वंशजों ने रचा आस्था और इतिहास का संगम

रानीबाग (नैनीताल)। कुमाऊं और गढ़वाल की सांस्कृतिक चेतना एक बार फिर रानीबाग स्थित ऐतिहासिक चित्रेश्वर धाम में जीवंत हो उठी, जब बड़ी संख्या में कत्यूरी वंशज अपनी कुलदेवी और आराध्य जियारानी के दर्शन के लिए यहां पहुंचे। ढोल-दमाऊं, नगाड़ों, मसक बीन और तालियों की गूंज के बीच ‘जय जिया रानी’ के जयकारों से पूरा क्षेत्र भक्तिरस में सराबोर हो गया।

श्रद्धालुओं ने गार्गी नदी में विधिवत पवित्र स्नान कर देवी जियारानी की गुफा में दर्शन-पूजन किया। इसके बाद रात्रि भर जागरण का आयोजन हुआ, जिसमें देवी जियारानी की वीरगाथाओं, पराक्रम और कत्यूरी वंश के गौरवशाली इतिहास का भावपूर्ण वर्णन किया गया। जागरण के दौरान लोकगीतों और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन पर श्रद्धालु देर रात तक भक्ति में लीन नजर आए।

कुमाऊं–गढ़वाल से जुटे कत्यूरी परिवार

इस ऐतिहासिक आयोजन में कुमाऊं के रानीखेत, कोटाबाग, सल्ट, चौखुटिया, रामनगर सहित अनेक क्षेत्रों से कत्यूरी परिवार पहुंचे, वहीं गढ़वाल मंडल से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता की। आयोजन ने स्पष्ट कर दिया कि कत्यूरी वंश की सांस्कृतिक जड़ें आज भी पूरे उत्तराखंड में गहराई से जुड़ी हुई हैं।

चित्रेश्वर धाम: आस्था और इतिहास का केंद्र

गार्गी नदी के तट पर स्थित चित्रशिला क्षेत्र को आस्था और ऐतिहासिक विरासत का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यहां ब्रह्मा, विष्णु और महेश की संयुक्त शक्ति का वास है। यही कारण है कि यह स्थल सदियों से साधना, तप और आराधना का प्रमुख केंद्र रहा है।

इतिहासकारों के अनुसार सातवीं सदी में अयोध्या से आए सूर्यवंशी कत्यूरी शासकों ने कुमाऊं और गढ़वाल के विशाल भूभाग पर लंबे समय तक शासन किया। जियारानी को कत्यूरी वंश की आराध्य देवी और वीरता की प्रतीक माना जाता है, जिनकी स्मृति में यह परंपरा आज भी जीवित है।

स्थानीय युवाओं और जनप्रतिनिधियों की सराहनीय पहल

श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए रानीबाग के स्थानीय युवाओं और जनप्रतिनिधियों ने अनुकरणीय पहल की। रानीबाग हाई स्कूल में ठहरने की व्यवस्था के साथ-साथ भोजन और पेयजल की समुचित व्यवस्था की गई। देर रात तक स्वयंसेवक श्रद्धालुओं की सेवा में जुटे रहे और व्यवस्थाओं को सुचारु बनाए रखा।

आस्था के साथ सांस्कृतिक संरक्षण का संदेश

यह आयोजन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं रहा, बल्कि उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, लोक परंपराओं और ऐतिहासिक चेतना को सहेजने का मजबूत संदेश भी देता नजर आया। कत्यूरी वंशजों की यह एकजुटता आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने और अपनी विरासत पर गर्व करने की प्रेरणा देती है।


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