बंद होते सरकारी स्कूल
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उत्तराखंड में बंद होते सरकारी स्कूल: शिक्षा व्यवस्था पर गहराता संकट

देहरादून। उत्तराखंड में सरकारी स्कूलों के लगातार बंद होने का मुद्दा अब गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। राज्य सरकार द्वारा विधानसभा सत्र के दौरान दी गई जानकारी के अनुसार, पिछले पांच वर्षों (2020-2025) में प्रदेश के 826 प्राथमिक विद्यालय बंद हो चुके हैं। इनमें टिहरी गढ़वाल में 262, पौड़ी गढ़वाल में 120, पिथौरागढ़ में 104 और अल्मोड़ा में 83 स्कूल शामिल हैं। अन्य जिलों में भी कमोबेश यही स्थिति बनी हुई है।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, वर्तमान में राज्य में 10,940 प्राथमिक विद्यालय संचालित हैं, लेकिन इनमें से कई स्कूल एकल शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं या फिर शून्य नामांकन की स्थिति में हैं। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति केवल स्कूलों की संख्या घटने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों में शिक्षा व्यवस्था की कमजोर होती नींव को भी दर्शाती है।

सरकार की ओर से स्कूल बंद होने के पीछे पलायन को एक प्रमुख कारण बताया जा रहा है। हालांकि, जानकारों का कहना है कि पलायन खुद एक बड़ी समस्या है, जिसकी जड़ में रोजगार, स्वास्थ्य सेवाओं और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कमी है। पहाड़ी क्षेत्रों से लगातार हो रहे पलायन के कारण गांव खाली हो रहे हैं, जिसका सीधा असर स्कूलों में नामांकन पर पड़ रहा है।

वहीं, सरकार द्वारा लागू की जा रही क्लस्टर प्रणाली (स्कूल मर्जर) को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इस नीति के चलते दूरदराज के क्षेत्रों में बच्चों को स्कूल पहुंचने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ रही है, जिससे ड्रॉपआउट दर बढ़ने की आशंका है। इसका सबसे अधिक प्रभाव गरीब, ग्रामीण और वंचित वर्ग के बच्चों पर पड़ सकता है।

शिक्षा क्षेत्र में बुनियादी सुविधाओं की कमी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। कई स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक, शौचालय, बिजली और अन्य आवश्यक संसाधनों का अभाव है। इसके चलते अभिभावक निजी स्कूलों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे सरकारी स्कूलों में नामांकन लगातार घट रहा है।

विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि वर्ष 2025 में एक भी नया सरकारी स्कूल नहीं खोला जाना राज्य की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े करता है। ऐसे में आवश्यकता है कि सरकार शिक्षा क्षेत्र में ठोस और दीर्घकालिक योजनाएं बनाए, ताकि न केवल पलायन पर रोक लगाई जा सके बल्कि पर्वतीय क्षेत्रों में शिक्षा की स्थिति को भी सुधारा जा सके।

शिक्षा किसी भी समाज के विकास की आधारशिला होती है। यदि समय रहते इस दिशा में प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में यह संकट और गहरा सकता है, जिसका असर पूरे राज्य के सामाजिक और आर्थिक ढांचे पर पड़ेगा।

(महेश)
महासचिव
परिवर्तनकामी छात्र संगठन (पछास)

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