बनभूलपुरा रेलवे अतिक्रमण मामला: सुप्रीम फैसला आज संभव, जानिए 1880 से 2025 तक का पूरा कानूनी सफ़र
हल्द्वानी, बनभूलपुरा/गफूर बस्ती: रेलवे की 31.87 हेक्टेयर अतिक्रमित भूमि को लेकर वर्षों से चली आ रही कानूनी लड़ाई आज निर्णायक मोड़ पर पहुँच सकती है। सुप्रीम कोर्ट में इस बहुचर्चित मामले पर आज अंतिम आदेश आने की संभावना है। इस मौके पर हम पूरे मामले का संक्षिप्त लेकिन महत्वपूर्ण इतिहास पेश कर रहे हैं, ताकि जनता तथ्य समझ सके।
कहां से शुरू हुआ विवाद? (1880 से शुरुआत)
हल्द्वानी–काठगोदाम रेल लाइन का निर्माण वर्ष 1880 में किया गया था, जिसके बाद यह क्षेत्र वाणिज्यिक और आवागमन के लिहाज से लगातार विकसित होता रहा। समय के साथ रेल लाइन के आसपास अवैध निर्माण और अतिक्रमण तेज़ी से फैलने लगे, लेकिन जिम्मेदार विभागों और अधिकारियों द्वारा वर्षों तक इस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। हालात यह रहे कि स्थानीय निकायों और राजनैतिक दबाव में कई बार इन अनधिकृत बस्तियों को बिजली, पानी, सड़क जैसी सुविधाएँ प्रदान की गईं, जिससे इन क्षेत्रों को एक तरह से वैधता जैसा दर्जा मिलता गया। यही ढिलाई आगे चलकर विवादों और कानूनी संघर्ष का कारण बनी।
2007: हाईकोर्ट ने पहला बड़ा एक्शन
बनभूलपुरा क्षेत्र में पहले भी बड़े पैमाने पर अतिक्रमण विरोधी अभियान चलाया गया था, जिसके तहत करीब 24,000 वर्गमीटर भूमि को अतिक्रमणमुक्त कराया गया था। उस समय प्रशासन ने भारी पुलिस बल और मशीनरी की मदद से कब्जे हटाए थे और दावा किया था कि यह जमीन अब किसी भी तरह के अवैध निर्माण से सुरक्षित रहेगी। लेकिन समय बीतते ही विभागीय मिलीभगत, लापरवाही और भ्रष्टाचार के कारण कुछ ही महीनों में उसी जमीन पर दोबारा अवैध कब्जे होने लगे। संबंधित अधिकारियों द्वारा निगरानी की कमी और प्रभावी कार्रवाई न होने से अतिक्रमण करने वालों के हौसले बढ़े और स्थिति फिर से पुराने रूप में लौटती गई।
2013: रविशंकर जोशी की याचिका से फिर खुला मामला
हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सख्त रुख अपनाया और पूरे अतिक्रमण को दस हफ्तों के भीतर हटाने का स्पष्ट आदेश जारी किया। अदालत ने कहा कि रेलवे भूमि पर किसी भी तरह का अवैध कब्जा बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और निर्धारित समयसीमा में कार्रवाई पूरी करना प्रशासन की जिम्मेदारी है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने नैनीताल के एसएसपी को निर्देश दिया कि अतिक्रमण हटाने के दौरान रेलवे और प्रशासनिक टीम को पूर्ण सुरक्षा उपलब्ध कराई जाए, ताकि किसी भी तरह की बाधा, विरोध या कानून व्यवस्था की स्थिति न पैदा हो। कोर्ट के इस निर्देश ने पूरे अभियान को एक नई गति और मजबूती दी, जिससे संबंधित विभागों पर समयबद्ध कार्रवाई का दबाव और बढ़ गया।
2017: सरकार ने झूठा हलफनामा दिया, सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई
राज्य सरकार ने कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए दावा किया कि जिस भूमि पर अतिक्रमण हुआ है, वह रेलवे की नहीं बल्कि नजूल भूमि है। सरकार का कहना था कि भूमि के स्वामित्व को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है, इसलिए रेलवे की ओर से की जा रही कार्रवाई उचित नहीं है। हालांकि, हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के इस तर्क को खारिज कर दिया और कड़ी टिप्पणियाँ करते हुए कहा कि रिकॉर्ड और साक्ष्य स्पष्ट रूप से इस जमीन को रेलवे की संपत्ति साबित करते हैं। अदालत ने राज्य सरकार की दलील को मामले को कमजोर करने और कार्रवाई में विलंब पैदा करने की कोशिश बताया। हाईकोर्ट के निर्णय के बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा, जहाँ सर्वोच्च अदालत ने मामले की जटिलता को देखते हुए फिलहाल तीन महीने की मोहलत दी और इस अवधि के लिए अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई पर रोक लगा दी। सुप्रीम कोर्ट के इस अंतरिम आदेश से अतिक्रमण प्रभावित क्षेत्र के लोगों को अस्थायी राहत तो मिली, लेकिन अंतिम निर्णय का इंतज़ार और भी महत्वपूर्ण हो गया।
2020–2021: 4365 अतिक्रमणकारियों पर बेदखली प्रक्रिया
रेलवे ने अदालत को जानकारी देते हुए बताया कि कुल 4365 मामलों में से 4356 मामलों की सुनवाई पूरी कर ली गई है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि रेलवे लंबे समय से इस मामले को कानूनी रूप से आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। दूसरी ओर, जिला प्रशासन ने भी अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए सर्वेक्षण और सीमांकन की विस्तृत रिपोर्ट कोर्ट में प्रस्तुत की। इस रिपोर्ट में साफ-साफ उल्लेख किया गया कि विवादित क्षेत्र की पूरी जमीन रेलवे की ही संपत्ति है और इसके दस्तावेज़ भी इस तथ्य की पुष्टि करते हैं। प्रशासनिक सर्वे और रेलवे के रिकॉर्ड मिलान के बाद यह स्थिति बिल्कुल स्पष्ट हो गई कि भूमि स्वामित्व को लेकर किसी भी तरह का भ्रम या विवाद नहीं है। इससे अदालत के सामने मामला और मजबूत हुआ तथा अतिक्रमण हटाने की आवश्यकता और भी स्पष्ट रूप से सामने आ गई।
2022: नई जनहित याचिका WPPIL-30/2022
रेलवे द्वारा लंबे समय तक प्रभावी कार्रवाई न किए जाने से निराश होकर रविशंकर जोशी ने इस मामले में एक नई याचिका दायर की, जिसमें उन्होंने अतिक्रमण हटाने और जमीन को सुरक्षित कराने की मांग उठाई। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने 22 मई 2022 को एक महत्वपूर्ण कदम उठाया और सार्वजनिक नोटिस जारी कर सभी प्रभावित लोगों से अपने-अपने दावों से संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत करने को कहा। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी के पास जमीन से जुड़े वैध कागज़ात हैं, तो उन्हें प्रमाण स्वरूप पेश किया जाए। लेकिन जब नोटिस के बाद कोर्ट में स्थिति स्पष्ट हुई, तो पाया गया कि एक भी अतिक्रमणकारी अपना दावा साबित नहीं कर सका। न तो किसी के पास वैध पट्टा था, न स्वामित्व का कोई प्रमाण—जिससे यह साफ हो गया कि कब्जे पूरी तरह अवैध थे और वर्षों से बिना किसी अधिकार के रेलवे भूमि पर बसे हुए थे। अदालत के सामने यह तथ्य आने के बाद मामले की गंभीरता और भी बढ़ गई और रेलवे भूमि को मुक्त कराने की आवश्यकता निर्विवाद रूप से सिद्ध हो गई।
