🕊️ दुल्हन बनी बारात की अगुआ, 100 बाराती लेकर पहुंची दूल्हे के घर — उत्तरकाशी की अनोखी जोजड़ा शादी बनी आकर्षण का केंद्र
उत्तरकाशी। शादियों में अब तक आपने हमेशा दूल्हे को बारात लेकर दुल्हन के घर जाते देखा होगा, लेकिन उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के एक सीमांत क्षेत्र में सदियों पुरानी एक ऐसी परंपरा आज भी जीवंत है, जहां दुल्हन खुद बारात लेकर दूल्हे के घर पहुंचती है।
इस अनोखी परंपरा को स्थानीय भाषा में ‘जोजड़ा शादी’ कहा जाता है, जो जौनसार-बाबर, मोरी, आराकोट और हिमाचल की सीमा से सटे इलाकों में आज भी उत्सव की तरह मनाई जाती है।
क्या है जोजड़ा शादी की परंपरा?
इस परंपरा में दुल्हन अपने परिजनों और बारातियों के साथ दूल्हे के घर पहुंचती है। शादी की सभी रस्में — फेरे, जयमाला और विदाई तक — दूल्हे के घर पर ही पूरी की जाती हैं।
कहा जाता है कि यह परंपरा उस समय से चली आ रही है जब इन पहाड़ी इलाकों में यात्रा कठिन होती थी और दूल्हा-दुल्हन के गांवों के बीच दूरी बहुत ज्यादा होती थी। ऐसे में दूल्हन पक्ष का बारात लेकर दूल्हे के घर पहुंचना आसान माना जाता था।
जागटा की कविता ने मनोज लखी के घर पहुंचकर निभाई परंपरा
हाल ही में उत्तरकाशी जिले के मोरी ब्लॉक के जागटा गांव की युवती कविता ने करीब 100 बारातियों के साथ अपने दूल्हे मनोज लखी के गांव क्लीच (बाबर क्षेत्र) पहुंचकर इस सदियों पुरानी परंपरा को जीवंत कर दिया।
बारात के स्वागत में पूरे गांव ने ढोल-दमाऊं और लोकगीतों के साथ नाच-गाने का आयोजन किया।
दूल्हे के घर पर फेरे और जयमाला की रस्में पूरी होने के बाद दोनों पक्षों ने पारंपरिक भोज (धुरखा) का आनंद लिया।
सांस्कृतिक महत्त्व
स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, यह परंपरा जौनसारी और हिमाचली संस्कृति का साझा स्वरूप है, जो समानता, पारिवारिक सम्मान और सामाजिक जुड़ाव का प्रतीक है।
इन क्षेत्रों में अब भी कुछ समुदायों में “जोजड़ा विवाह” या “लड़की की बारात” जैसी रस्में निभाई जाती हैं, जिनमें दोनों परिवार एक-दूसरे के घर जाकर रिश्तेदारी की परंपरा को निभाते हैं।
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आधुनिक दौर में भी कायम है परंपरा
भले ही आज के दौर में अधिकांश विवाह आधुनिक रीतियों से हो रहे हों, परंतु जौनसार-बाबर और आराकोट क्षेत्र के ग्रामीण समाज में यह परंपरा अब भी गौरव और सम्मान का विषय है।
लोग इसे सिर्फ शादी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उत्सव और विरासत के रूप में देखते हैं।
