Nainital District Court Building Representing Legal Verdict In POCSO Caseनैनीताल जिला एवं सत्र न्यायालय जहां पॉक्सो मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया गया।
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देवभूमि जन हुंकार, नैनीताल: जनपद नैनीताल की विशेष पॉक्सो अदालत ने एक महत्वपूर्ण और विस्तृत निर्णय पारित करते हुए पोक्सो अधिनियम और भारतीय दंड संहिता (IPC) की गंभीर धाराओं के अंतर्गत चल रहे एक आपराधिक मुकदमे में अभियुक्तों को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष अभियुक्तों के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को युक्तियुक्त संदेह से परे साबित करने में पूर्णतः असफल रहा है। इस बहुचर्चित मामले में बचाव पक्ष की ओर से प्रभावी पैरवी अधिवक्ता चन्दन सिंह मेहता द्वारा की गई थी

 क्या था पूरा मामला?

न्यायालय अपर जिला न्यायाधीश / एफटीएससी (पॉक्सो एक्ट) नैनीताल के पीठासीन अधिकारी श्री सुधीर तोमर की अदालत में पोक्सो संख्या 20/2026 (उत्तराखंड राज्य बनाम अन्य) की विचारण कार्रवाई संपन्न हुई। यह मामला थाना पट्टी सौड़, मल्लीताल, जिला नैनीताल के अंतर्गत दर्ज किया गया था

अभियोजन पक्ष की ओर से आरोप लगाया गया था कि एक निश्चित दिनांक को अभियुक्तों द्वारा पीड़िता के साथ छेड़छाड़, आपराधिक बल का प्रयोग, मारपीट, गाली-गलौज और जान से मारने की धमकियां दी गईं। मामले में पुलिस द्वारा विवेचना पूर्ण कर न्यायालय में आरोप पत्र प्रेषित किया गया था, जिसके उपरांत अदालत में साक्ष्य और विचारण की प्रक्रिया चली।

 अदालत के फैसले के प्रमुख आधार और विधिक टिप्पणियां

विचारण के दौरान न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और पत्रावली पर उपलब्ध मौखिक व दस्तावेजी साक्ष्यों का सूक्ष्म परीक्षण करने के बाद निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं को आधार बनाया:

  1.  अदालत ने पाया कि कथित घटना और प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने के बीच लगभग 19 दिन का लंबा अंतराल (विलंब) था, जिसका कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण अभियोजन द्वारा नहीं दिया गया। उच्चतम न्यायालय के विधि नजीरों का हवाला देते हुए अदालत ने माना कि अस्पष्ट और अत्यधिक विलंब से दर्ज एफआईआर पर संदेह की गुंजाइश बनी रहती है।

  2. पीड़िता, उसके परिजनों और अन्य अभियोजन साक्षियों (गवाहों) के बयानों में घटना स्थल पर उपस्थिति, बचाव और पूरी पटकथा को लेकर आपस में भारी विरोधाभास पाए गए। कई गवाहों के बयान एक-दूसरे के विपरीत साबित हुए।

  3. मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि पीड़िता की ओर से कथित मारपीट या शारीरिक हमले से संबंधित कोई भी चिकित्सकीय (Medical) परीक्षण रिपोर्ट या डॉक्टर का पर्चा पत्रावली पर दाखिल नहीं किया गया था। विवेचक और अन्य गवाहों ने भी इस बात की पुष्टि की कि कोई मेडिकल परीक्षण नहीं कराया गया था।

  4.  बचाव पक्ष के विद्वान अधिवक्ता श्री चन्दन सिंह मेहता द्वारा यह तथ्य प्रमुखता से रखा गया कि दोनों पक्षों के घरों के बीच सार्वजनिक पेयजल आपूर्ति की पाइपलाइन और नल को लेकर पूर्व से विवाद व मनमुटाव था। अदालत ने भी स्वीकार किया कि घटना के दिन पानी की सप्लाई को लेकर दोनों पक्षों के बीच बहसबाजी हुई थी, जिससे रंजिशवश झूठी रिपोर्ट लिखाए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

  5. अदालत ने स्पष्ट किया कि गाली-गलौज (धारा 504) और आपराधिक धमकी (धारा 506) के आरोप को साबित करने के लिए सटीक शब्दों और वास्तविक संत्रास का होना जरूरी है, जो अभियोजन साक्ष्यों से साबित नहीं हो सका।

न्यायिक आदेश: अभियुक्त दोषमुक्त

समस्त साक्ष्यों, विधिक प्रावधानों और तर्कों की समीक्षा के उपरांत पीठासीन अधिकारी सुधीर तोमर ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष अभियुक्तों के विरुद्ध लगाए गए दोषों को संदेह से परे सिद्ध करने में विफल रहा है।

परिणामस्वरूप, अदालत ने अभियुक्त चन्दन प्रकाश उर्फ चन्द्र प्रकाश को धारा 354, 354डी, 323, 504, 506 भा.द.सं. एवं 7/8 व 11/12 पॉक्सो एक्ट तथा अभियुक्ता भावना आर्या को धारा 323, 504 व 506 भा.द.सं. के सभी आरोपों से दोषमुक्त (Acquitted) कर दिया है। अदालत ने उनके जमानत व बंधपत्र निरस्त कर जमानतियों को दायित्वों से उन्मोचित कर दिया है।


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