देवभूमि जन हुंकार, नई दिल्ली / राष्ट्रीय ब्यूरो: राष्ट्रीय राजधानी से इस वक्त की एक बहुत बड़ी राजनीतिक खबर सामने आ रही है। इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित रिपोर्ट और उस पर भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) की प्रतिक्रिया के बाद वामपंथी दल भाकपा (माले) ने एक बेहद कड़ा और विस्तृत बयान जारी किया है। पार्टी ने आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग का हालिया बयान इस बात की स्पष्ट पुष्टि करता है कि आयोग के भीतर गंभीर मतभेद हैं और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार की भूमिका पूरी तरह मनमानी रही है।
भाकपा (माले) ने अपने आधिकारिक बयान में कहा है कि चुनाव आयुक्तों द्वारा उठाए गए मुद्दे उन आपत्तियों की पुष्टि करते हैं जिन्हें पार्टी सहित कई अन्य लोगों द्वारा लगातार उठाया जाता रहा है। चुनाव आयोग द्वारा इस पूरे घटनाक्रम को ‘एकतरफा तस्वीर’ बताकर यह कहना कि यह आयोग के अंदर एक सामान्य प्रक्रिया है, असल में पूरे मामले को हल्का करने और बचाव न किए जा सकने वाले कृत्य को बचाने की एक दयनीय कोशिश है।
पार्टी ने कहा कि इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट केवल उन अनियमितताओं की पुष्टि कर रही है, जिन्हें एसआईआर (SIR) प्रक्रिया से संबंधित विभिन्न सार्वजनिक ऑडिट और अध्ययनों में पहले ही बेनकाब किया जा चुका है।
माले के अनुसार, इस एसआईआर की गलत और त्रुटिपूर्ण प्रक्रिया के कारण देश में पहले ही लाखों मतदाता अपने बुनियादी मतदान के अधिकार से वंचित होकर गंभीर मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। जब एसआईआर के माध्यम से इतनी त्रुटिपूर्ण और गलत मतदाता सूचियां तैयार की गईं, तो उनके आधार पर कराए गए चुनाव भला चुनाव आयोग की तथाकथित ‘सफलता’ का सर्टिफिकेट कैसे बन सकते हैं?
इंडियन एक्सप्रेस की जांच रिपोर्ट और उस पर आयोग की मुहर लगने के बाद भाकपा (माले) ने केंद्र सरकार और संबंधित संवैधानिक संस्थाओं के सामने निम्नलिखित पांच सूत्रीय मांगें रखी हैं:
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महाभियोग: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर तत्काल महाभियोग चलाया जाए।
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निलंबन: एसआईआर (SIR) प्रक्रिया को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाए।
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अधिकारों की बहाली: गलत तरीके से मतदाता सूची से बाहर किए गए प्रत्येक मतदाता का मतदान का अधिकार तुरंत बहाल किया जाए।
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चुनाव रद्द हों: एसआईआर प्रक्रिया शुरू किए जाने के बाद देश में हुए सभी चुनावों को रद्द किया जाए और संबंधित राज्यों में दोबारा चुनाव कराने का आदेश दिया जाए।
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संवैधानिक संशोधन: चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के ऐतिहासिक फैसले की भावना के अनुरूप संवैधानिक संशोधन किया जाए, तथा चुनाव आयोग के कामकाज में निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।
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