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मुख्य शिक्षा अधिकारी टिहरी का इस्तीफा, पदोन्नति की अनदेखी से छलका दर्द

देहरादून: उत्तराखंड में शिक्षा विभाग के अधिकारियों और शिक्षकों की पदोन्नति में हो रही देरी को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। हाल ही में, टिहरी के मुख्य शिक्षा अधिकारी (CEO) एसपी सेमवाल ने अपने पद से त्यागपत्र भेज दिया है, जिसमें उन्होंने आठ महीने से लंबित अपनी अपर निदेशक पद पर पदोन्नति में हो रही देरी का जिक्र किया है। उनके इस कदम ने शिक्षा विभाग में व्याप्त विसंगतियों और पदोन्नति में देरी से आ रही हताशा को उजागर कर दिया है।

सेमवाल ने अपने त्यागपत्र में लिखा है कि फरवरी 2025 में रिक्तियों की घोषणा और सभी अर्हताएं पूरी होने के बावजूद, आठ महीने तक पदोन्नति का इंतजार करना निराशाजनक है। उन्होंने विभाग में अपनी सेवाओं का भी विस्तार से उल्लेख किया, जिसमें देहरादून में राज्य के पहले राजीव गांधी नवोदय विद्यालय की स्थापना में उनके योगदान का भी जिक्र है।

यह घटना तब सामने आई है जब विभाग में पदोन्नति को लेकर पहले से ही घमासान मचा हुआ है। राजकीय शिक्षक संघ के प्रदेश महामंत्री रमेश पैन्यूली ने भी सेमवाल के इस्तीफे को सही ठहराते हुए कहा है कि विभागीय कमियों की वजह से न सिर्फ शिक्षक बल्कि अधिकारी भी परेशान हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि विभाग ने वरिष्ठता निर्धारण के स्पष्ट नियम होने के बावजूद गलत वरिष्ठता सूचियां बनाई हैं और एक महत्वपूर्ण शासनादेश (16 जून 2001 को जारी शासनादेश 2158) को भी गायब कर दिया है, जिससे पदोन्नति में विसंगतियां पैदा हुई हैं।

यह मामला अब कानूनी पेंच में भी फंस चुका है। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने एलटी (प्रशिक्षित स्नातक) शिक्षकों की पदोन्नति को लेकर एक सीनियरिटी लिस्ट बनाने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने 25 तारीख तक इस मामले में सुनवाई की अगली तारीख तय की है।

एक तरफ जहां अधिकारी और शिक्षक वर्ग परेशान है, वहीं सरकार ने स्थिति को संभालने के लिए कुछ कदम उठाए हैं। हाल ही में, शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने अधिकारियों को शिक्षकों को अंतरिम पदोन्नति देने के निर्देश दिए थे। यह कदम वरिष्ठता विवाद के कारण रुकी हुई पदोन्नतियों को गति देने के लिए उठाया गया है। उन्होंने कहा कि सरकार की मंशा है कि पात्र शिक्षकों को जल्द पदोन्नति का लाभ मिले ताकि शिक्षण व्यवस्था प्रभावित न हो।

टिहरी के सीईओ सेमवाल का इस्तीफा इस बात का स्पष्ट संकेत है कि उत्तराखंड शिक्षा विभाग में पदोन्नति और वरिष्ठता से जुड़े मामलों को तुरंत सुलझाने की आवश्यकता है ताकि विभाग में कार्यकुशलता और मनोबल बना रहे।यह छवि उत्तराखंड के शिक्षा विभाग से संबंधित एक आधिकारिक पत्र (पत्र संख्या पी0एम0-एस0ई0पी0/2022) जैसी प्रतीत होती है, जिसकी तारीख 23 सितंबर 2025 है। पत्र का विषय मुख्य शिक्षा अधिकारियों की पदोन्नति से संबंधित हो सकता है।

इस जानकारी और उत्तराखंड शिक्षा विभाग में हाल ही में हुए घटनाक्रमों के आधार पर एक संभावित समाचार रिपोर्ट इस प्रकार है:

राजकीय शिक्षक संघ के प्रदेश महामंत्री रमेश पैन्यूली ने सेमवाल के इस्तीफे पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह घटना दर्शाती है कि विभागीय कमियों के कारण न सिर्फ शिक्षक बल्कि वरिष्ठ अधिकारी भी परेशान हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि विभाग ने वरिष्ठता निर्धारण के स्पष्ट नियम होने के बावजूद गलत वरिष्ठता सूचियां बनाई हैं और शिक्षकों की पदोन्नति में बाधा डालने के लिए जानबूझकर कुछ महत्वपूर्ण शासनादेशों को भी गायब कर दिया है।

यह मामला पहले से ही कानूनी पेंच में फंसा हुआ है। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने एलटी (प्रशिक्षित स्नातक) शिक्षकों की पदोन्नति के लिए वरिष्ठता सूची बनाने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने इस मामले पर सुनवाई के लिए 25 सितंबर की तारीख निर्धारित की है।

इस बीच, शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने अधिकारियों को शिक्षकों को अंतरिम पदोन्नति देने के निर्देश दिए हैं ताकि वरिष्ठता विवाद के कारण शिक्षण व्यवस्था बाधित न हो। उन्होंने कहा कि सरकार पात्र शिक्षकों को जल्द से जल्द पदोन्नति का लाभ दिलाना चाहती है।

टिहरी के सीईओ का इस्तीफा, शिक्षा विभाग में लंबित पदोन्नति और वरिष्ठता संबंधी मामलों को तुरंत सुलझाने की आवश्यकता पर जोर देता है ताकि अधिकारियों और शिक्षकों का मनोबल बना रहे और राज्य की शिक्षा व्यवस्था सुचारू रूप से चल सके।

सेमवाल ने अपने पत्र में शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली और शिक्षकों की समस्याओं पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि वर्षों से लंबित मांगों और अनदेखी के कारण वे मानसिक रूप से दबाव महसूस कर रहे हैं। उन्होंने सेवा के दौरान किए गए विभिन्न प्रयासों का भी जिक्र किया, जैसे—वर्ष 2002 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी द्वारा “राजकीय मॉडल विद्यालय योजना” की शुरुआत, विद्यालयी शिक्षा में तकनीकी उन्नयन और वर्चुअल स्टूडियो की स्थापना और शिक्षकों की समस्याओं के समाधान के लिए निरंतर पहल।

उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि शासन की नीतियों और विभागीय जटिलताओं के चलते शिक्षकों/कर्मचारियों की समस्याओं का उचित समाधान नहीं हो पा रहा है। इसके चलते वे 8 माह पूर्व से ही मानसिक दबाव में हैं और अब सेवा जारी रखना उनके लिए संभव नहीं है।


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