मूल लेखक: डॉ. जी. एस. रावत, NASI वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं श्री अनूप साह, (पद्मश्री सम्मानित)
बागेश्वर, उत्तराखंड। उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र की पहचान माने जाने वाले पिंडारी परिदृश्य की प्राकृतिक सुंदरता और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत पर कई चुनौतियां मंडरा रही हैं। एक ओर खाती गांव के ग्रामीण खेती में घटती उत्पादकता, जंगली जानवरों से फसलों को नुकसान और सीमित आजीविका के विकल्पों से जूझ रहे हैं, तो दूसरी ओर ऊंचाई वाले क्षेत्रों में वन्यजीवों और औषधीय पौधों की उपलब्धता में गिरावट की चिंता सामने आई है। पर्यटन के लिए विकसित की गई कुछ सुविधाओं का उचित रखरखाव नहीं होने और संवेदनशील बुग्यालों को नुकसान पहुंचने की बात भी सामने आई है।
वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. जी. एस. रावत और पद्मश्री सम्मानित अनूप साह ने अक्टूबर 2026 में पिंडारी हिमनद तथा सरयू जलग्रहण क्षेत्र के ऊपरी हिस्सों के आसपास की यात्रा के दौरान किए गए अवलोकनों के आधार पर इस क्षेत्र के संरक्षण और विकास से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए हैं। उनके निष्कर्षों के अनुसार, पिंडारी क्षेत्र को बचाने के लिए प्रकृति संरक्षण, स्थानीय संस्कृति, ग्रामीण आजीविका और पर्यटन प्रबंधन को एक साथ लेकर चलने की जरूरत है।
पिंडारी परिदृश्य क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
बागेश्वर जिले में स्थित पिंडारी परिदृश्य उत्तराखंड के प्रमुख प्राकृतिक क्षेत्रों में शामिल है। यह देश-विदेश के प्रकृतिविदों, शोधकर्ताओं, पर्वतारोहियों, पदयात्रियों और साहसिक पर्यटन के शौकीनों को आकर्षित करता है।
इस क्षेत्र की पहचान सुंदरढूंगा, पिंडारी और सरयू घाटियों से है। पिंडारी क्षेत्र में कफनी घाटी भी शामिल है। यहां मैकटोली, बलजूरी, पनवाली द्वार, नंदा खाट, नंदा कोट, छांगुज, लास्पा धुरा और डांगथल जैसी पर्वत चोटियां मौजूद हैं। ट्रेल्स पास और दानू धुरा जैसे ऊंचे पर्वतीय दर्रे भी इस परिदृश्य का हिस्सा हैं।
क्षेत्र का निचला भाग मल्ला दानपुर के नाम से जाना जाता है। यहां के समुदाय लंबे समय से कृषि और पशुपालन पर निर्भर रहे हैं। स्थानीय लोगों के पास वनस्पतियों, वन्यजीवों और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ा पारंपरिक ज्ञान भी है।
यह पूरा परिदृश्य नंदा देवी जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र का हिस्सा है और बागेश्वर वन प्रभाग की ग्लेशियर रेंज के अंतर्गत आता है। इसलिए इसका महत्व केवल पर्यटन तक सीमित नहीं है, बल्कि जैव विविधता और स्थानीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण से भी जुड़ा हुआ है।
खाती गांव में खेती पर संकट, जंगली जानवरों से बढ़ी परेशानी
पिंडारी हिमनद के प्रवेशद्वार के रूप में प्रसिद्ध खाती गांव में कृषि उत्पादन में भारी गिरावट की बात सामने आई है। यात्रा के दौरान ग्रामीणों से मिली जानकारी के अनुसार, इसके पीछे युवाओं की खेती के प्रति घटती रुचि, बदलती जलवायु और वन्यजीवों द्वारा फसलों को नुकसान पहुंचाना प्रमुख कारण हैं।
ग्रामीणों की फसलों को लंगूर, बंदर, जंगली सूअर और साही जैसे जानवर नुकसान पहुंचाते हैं। कभी-कभी काले भालू की मौजूदगी से भी परेशानी होती है।
एक ग्रामीण ने बताया कि तेंदुए ने उसकी दो बकरियों को मार डाला था, जिससे उसे आर्थिक नुकसान हुआ। ग्रामीण को मुआवजा मिलने की प्रक्रिया को लेकर भी चिंता थी। नुकसान की सूचना देने के लिए भराड़ी स्थित रेंज कार्यालय तक जाना और फिर घटना की पुष्टि कराने की प्रक्रिया उसके लिए कठिन थी।
ग्रामीणों ने गांवों के आसपास वन्यजीवों की मौजूदगी बढ़ने की बात कही, जबकि आसपास के जंगलों में वन्यजीवों की संख्या घटने की भी चिंता जताई। यह स्थिति मानव-वन्यजीव संघर्ष को समझने के लिए वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास, भोजन की उपलब्धता और ग्रामीण आजीविका के बीच संबंधों का अध्ययन करने की आवश्यकता दर्शाती है।
शहद और घी की पहचान वाला मल्ला दानपुर, आजीविका के नए अवसरों की जरूरत
मल्ला दानपुर क्षेत्र कभी शहद और घी जैसे उत्पादों के लिए जाना जाता था। लेकिन वर्तमान में गांवों में मधुमक्खी पालन करने वाले परिवारों की संख्या सीमित रह गई है।
यात्रा के दौरान एक महिला मधुमक्खी पालक सामने आई, जिसके पास मधुमक्खियों के छह बक्से थे। वह मधुमक्खी पालन और शहद निकालने की प्रक्रिया में दक्ष थी। हालांकि, अधिकांश स्थानीय मधुमक्खी पालक आधुनिक बक्सों की तुलना में पारंपरिक लकड़ी के लट्ठों से बने छत्तों को अधिक पसंद करते हैं। उनका मानना है कि मधुमक्खियां आधुनिक बक्सों में टिककर नहीं रहतीं।
शहद निकालने की प्रचलित विधियों में भी सुधार की जरूरत बताई गई है, क्योंकि मौजूदा तरीकों में काफी शहद व्यर्थ चला जाता है।
विशेषज्ञों ने ग्रामीणों को वैज्ञानिक मधुमक्खी पालन, शहद निकालने की बेहतर तकनीकों, स्थानीय सब्जियों के उत्पादन और मशरूम की खेती का प्रशिक्षण देने की जरूरत पर जोर दिया है। तकनीकी सहायता और बाजार से जुड़ाव मिलने पर ये गतिविधियां ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ाने में सहायक हो सकती हैं।
85 वर्षीय बुजुर्ग ने बताई वन्यजीवों और औषधीय पौधों में गिरावट की कहानी
यात्रा के अंतिम चरण में शोधकर्ताओं की मुलाकात झूनी गांव के 85 वर्षीय भागीचंद्र सिंह टाकुली से हुई। उन्हें स्थानीय वनस्पतियों, जीव-जंतुओं और औषधीय महत्व वाले पौधों के बारे में व्यापक पारंपरिक ज्ञान प्राप्त है।
उनके अनुसार, लगभग 40 से 50 वर्ष पहले सरयू जलग्रहण क्षेत्र के ऊपरी हिस्सों और पंखू क्षेत्र में वन्यजीवों की अच्छी मौजूदगी थी। उस समय कस्तूरी मृग, सांभर, काकड़ और एशियाई काला भालू जैसे वन्यजीव यहां पाए जाते थे।
उन्होंने बताया कि वर्ष 1972 में उन्होंने कस्तूरी मृग के दो शावकों को पकड़ा था, जिन्हें धरमघर स्थित कस्तूरी मृग प्रजनन केंद्र ले जाया गया था।
भागीचंद्र सिंह टाकुली के अनुभव के अनुसार, ऊंचाई वाले क्षेत्रों के जंगलों को नुकसान पहुंचा है और औषधीय पौधों की कई प्रजातियों में गिरावट आई है। उन्होंने यह भी कहा कि कस्तूरी मृग अब इस क्षेत्र में स्थानीय स्तर पर नहीं दिखाई देता।
यहां स्थानीय स्तर पर विलुप्त होने का अर्थ है कि संबंधित प्रजाति उस विशेष क्षेत्र में अब नहीं मिल रही है। इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रजाति पूरी दुनिया से विलुप्त हो चुकी है।
उनके अनुसार, मल्ला दानपुर के लोगों के लिए आजीविका के प्रमुख साधनों में भांग की खेती, उच्च हिमालयी बुग्यालों से कीड़ा जड़ी का संग्रह और पर्यटकों तथा पदयात्रियों की सहायता करना शामिल है। उन्होंने कीड़ा जड़ी की उपलब्धता में भी तेजी से कमी आने की बात कही।
वनों का क्षरण, औषधीय वनस्पतियों की कमी और वन्यजीवों में गिरावट स्थानीय समुदायों की आजीविका, पारंपरिक ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत के लिए चुनौती बन सकते हैं।
पिंडारी में पर्यटन की अपार संभावनाएं, लेकिन व्यवस्थाओं पर सवाल
पिंडारी परिदृश्य में पारिस्थितिकी पर्यटन, प्रकृति शिक्षा, पक्षी अवलोकन और साहसिक पर्यटन की व्यापक संभावनाएं हैं। फिलहाल अधिकांश पर्यटक और पदयात्री पिंडारी हिमनद के जीरो पॉइंट तक ही जाते हैं, जबकि आसपास के क्षेत्र में अन्य आकर्षक स्थलों की पहचान और विकास की संभावनाएं भी मौजूद हैं।
लेखकों ने सुझाव दिया है कि ऐसे स्थलों की पहचान और संरक्षण करते हुए स्थानीय पारिस्थितिकी पर्यटन समितियों के माध्यम से उन्हें विकसित किया जाए। पर्यटन से होने वाले लाभों का उचित वितरण सुनिश्चित करना और प्राकृतिक संसाधनों पर अनावश्यक दबाव रोकना भी जरूरी है।
पर्यटन विभाग ने खाती से जीरो पॉइंट के बीच वर्षा से बचाव के लिए शेड, इग्लू आकार की झोपड़ियां, दृश्यावलोकन स्थल और स्थायी शौचालय जैसी सुविधाएं विकसित की हैं। हालांकि, लेखकों के यात्रा संबंधी अवलोकनों के अनुसार, रखरखाव की कमी के कारण इनमें से कई सुविधाएं जर्जर हो गई हैं और उपयोग के योग्य नहीं रह गई हैं।
कुछ दृश्यावलोकन स्थल और वर्षा-आश्रय अधूरे पाए गए। उनके अनुसार, कुछ स्थानों पर सुविधाओं के निर्माण और स्थान चयन से संवेदनशील अल्पाइन घास के मैदानों को नुकसान पहुंचा है। इससे मिट्टी के कटाव, वनस्पतियों के नुकसान और प्राकृतिक परिदृश्य की सुंदरता प्रभावित होने की चिंता सामने आई है।
लेखकों ने इस स्थिति को गंभीर विडंबना बताया है कि प्रकृति का सौंदर्य दिखाने के उद्देश्य से बनाई गई सुविधाएं ही कुछ स्थानों पर प्रकृति को नुकसान पहुंचा रही हैं।
पर्यटकों के लिए सही सूचना और वैज्ञानिक कैरिंग कैपेसिटी आकलन जरूरी
पदयात्रा मार्ग के किनारे लगे कई सूचना-पट्टों पर पुरानी, अनावश्यक या भ्रामक जानकारी होने की बात भी लेखकों ने उठाई है।
उनका सुझाव है कि पर्यटकों को पूरे पिंडारी परिदृश्य का स्पष्ट मानचित्र और क्या करें तथा क्या न करें से संबंधित निर्देश उपलब्ध कराए जाएं। ऐसी जानकारी खाती के प्रवेश बिंदु और खाती, द्वाली तथा फुरकिया स्थित विश्रामगृहों में प्रदर्शित की जानी चाहिए।
इसके साथ ही मुख्य पदयात्रा मार्ग की पर्यावरणीय वहन क्षमता यानी Carrying Capacity का वैज्ञानिक आकलन आवश्यक बताया गया है। इससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि प्राकृतिक पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना किसी मार्ग पर कितने पर्यटकों की आवाजाही उचित होगी।
लेखकों के अनुसार, पर्यटकों को अन्य उपयुक्त मार्गों की ओर भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, ताकि मुख्य मार्ग पर दबाव कम हो सके।
पर्यटन का उद्देश्य केवल अधिक से अधिक लोगों को किसी स्थल तक पहुंचाना नहीं होना चाहिए। पर्यटन ऐसा होना चाहिए, जिससे लोग प्रकृति का अनुभव कर सकें, स्थानीय समुदायों को आर्थिक लाभ मिले और प्राकृतिक संसाधनों को दीर्घकालिक नुकसान न पहुंचे।
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स्थानीय संस्कृति बचाने में महिला स्वयं सहायता समूह ने दिखाई राह
पिंडारी क्षेत्र में प्राकृतिक विरासत के साथ-साथ स्थानीय संस्कृति और सामाजिक जीवन का संरक्षण भी महत्वपूर्ण है। लेखकों ने क्षेत्र के कुछ गांवों में बेरोजगारी और युवाओं के सामने मौजूद सामाजिक चुनौतियों का उल्लेख किया है।
इसी बीच जटोली गांव और वाछम क्षेत्र के महिला स्वयं सहायता समूह की पहल एक सकारात्मक उदाहरण के रूप में सामने आई है।
लेखकों के अनुसार, समूह ने शराब के सेवन और बिक्री पर सख्ती से प्रतिबंध लगाया है। इसके साथ ही गांव के रास्तों और घरों के आसपास प्लास्टिक के रैपर तथा बोतलें फेंकने की समस्या को जुर्माने के माध्यम से नियंत्रित करने का प्रयास किया गया है।
यह पहल दिखाती है कि स्थानीय समुदाय अपनी सांस्कृतिक गरिमा, सामाजिक अनुशासन और पर्यावरण की रक्षा के लिए संगठित होकर प्रभावी कदम उठा सकते हैं।
लेखकों ने ऐसी पहलों को प्रोत्साहित करने और पिंडारी परिदृश्य के दूसरे गांवों तक पहुंचाने का सुझाव दिया है।
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युवाओं के लिए प्रकृति शिक्षा और हरित रोजगार पर जोर
पिंडारी क्षेत्र के युवाओं को प्रकृति संरक्षण से जोड़ने और रोजगार के नए अवसर उपलब्ध कराने के लिए प्रकृति शिक्षा शिविर, वन्यजीव संरक्षण जागरूकता कार्यक्रम, पर्यावरणीय उत्तरदायित्व संबंधी प्रशिक्षण और हरित कौशल विकास कार्यक्रम उपयोगी हो सकते हैं।
स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित पर्यावरण-अनुकूल रोजगार को बढ़ावा देने से युवाओं की रोजगार क्षमता विकसित हो सकती है। साथ ही, वे अपने क्षेत्र की जैव विविधता और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में अधिक सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं।
लेखकों ने स्थानीय युवाओं और विद्यार्थियों को प्रवेश चौकी पर लिए जाने वाले प्रवेश शुल्क से छूट देने का सुझाव भी दिया है। इससे उन्हें अपने क्षेत्र की प्राकृतिक विरासत को समझने, उसका अध्ययन करने और उसके संरक्षण में भागीदारी निभाने के लिए प्रोत्साहन मिल सकता है।
पिंडारी का भविष्य बचाने के लिए संरक्षण और विकास में संतुलन जरूरी
डॉ. जी. एस. रावत और अनूप साह के लेख का मुख्य संदेश स्पष्ट है—पिंडारी परिदृश्य का संरक्षण केवल जंगलों या पर्वतों की रक्षा तक सीमित नहीं रह सकता। इसके लिए स्थानीय समुदायों की आजीविका, सांस्कृतिक परंपराओं, वन्यजीवों, औषधीय पौधों और पर्यटन व्यवस्था को एक साथ ध्यान में रखना होगा।
वनों की रक्षा के बिना वन्यजीवों को बचाना कठिन है। स्थानीय लोगों की आजीविका सुरक्षित किए बिना उनसे प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की अपेक्षा करना भी उचित नहीं है। इसी तरह, पर्यटन का सुव्यवस्थित प्रबंधन किए बिना इसकी आर्थिक संभावनाओं का दीर्घकालिक लाभ प्राप्त करना मुश्किल होगा।
लेखकों ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते संरक्षण और विकास के लिए समन्वित योजना लागू नहीं की गई, तो पिंडारी की प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।
उन्होंने इसकी तुलना उस मुर्गी से की है, जो सोने के अंडे देती थी, लेकिन लालच के कारण उसके मालिक ने उसे ही नष्ट कर दिया। यह उदाहरण याद दिलाता है कि प्रकृति से मिलने वाले संसाधनों का असीमित दोहन अंततः उसी संपदा को खत्म कर सकता है, जिस पर मानव जीवन और आजीविका निर्भर हैं।
पिंडारी परिदृश्य को बचाना केवल एक पर्यटन स्थल को सुरक्षित रखना नहीं, बल्कि हिमालय की प्राकृतिक संपदा, स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित रखना है।
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