हल्द्वानी। उत्तराखंड विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (UCOST) द्वारा वित्त पोषित परियोजना “सतत आजीविका के लिए नवाचारी जलीय कृषि: मछली तालाब डिज़ाइन एवं किसानों व शिक्षार्थियों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम द्वारा स्वरोजगार स्थिरता को बढ़ावा” के अंतर्गत गुरुवार को उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय, हल्द्वानी परिसर में एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया।
कार्यक्रम में भीमताल, नौकुचियाताल, सलड़ी सहित आसपास के विभिन्न क्षेत्रों से आए मछली पालक किसानों ने भाग लिया। प्रशिक्षण के दौरान विशेषज्ञों ने किसानों को वैज्ञानिक मछली पालन की आधुनिक तकनीकों, तालाब डिज़ाइन, जल गुणवत्ता प्रबंधन, मछली आहार, रोग नियंत्रण तथा सतत उत्पादन पद्धतियों के बारे में विस्तृत जानकारी दी।
इस प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य किसानों को आधुनिक तकनीकों से जोड़ते हुए उनकी आय बढ़ाना तथा मछली पालन के माध्यम से स्वरोजगार को मजबूत बनाना रहा।
कार्यक्रम की अध्यक्षता उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. नवीन चंद्र लोहनी ने की। उन्होंने अपने संबोधन में किसानों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने, नवाचारों को व्यवहार में लाने तथा मछली पालन को एक लाभकारी उद्यम के रूप में विकसित करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय के शिक्षार्थियों और किसानों के बीच समन्वय स्थापित होने से शिक्षार्थियों को व्यावहारिक ज्ञान मिलेगा और किसान भी नई तकनीकों का लाभ उठा सकेंगे।
इस अवसर पर प्रो. जितेंद्र पांडेय (निदेशक, कंप्यूटर विज्ञान), विज्ञान विद्याशाखा के निदेशक प्रो. पी.के. सहगल, प्रो. कमल देवलाल, प्रो. वीरेंद्र कुमार, डॉ. पूजा जुयाल, डॉ. प्रभा और डॉ. मुक्ता जोशी सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के दौरान कुलपति प्रो. नवीन चंद्र लोहनी, परियोजना के प्रधान अन्वेषक डॉ. श्याम सिंह कुंजवाल तथा सह-प्रधान अन्वेषक डॉ. वीरेंद्र कुमार ने उपस्थित किसानों को मछली आहार (फीड) वितरित किया और परियोजना के उद्देश्यों तथा भविष्य की कार्ययोजना के बारे में जानकारी दी।
अंत में परियोजना के प्रधान अन्वेषक डॉ. श्याम सिंह कुंजवाल ने उत्तराखंड विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (UCOST), देहरादून का आभार व्यक्त करते हुए भविष्य में भी इस प्रकार के प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण कार्यक्रम आयोजित करने की प्रतिबद्धता जताई।
कार्यक्रम किसानों के लिए ज्ञानवर्धक, उपयोगी और प्रेरणादायक साबित हुआ। उम्मीद जताई गई कि इससे क्षेत्र में सतत जलीय कृषि को बढ़ावा मिलेगा और किसानों की आत्मनिर्भरता मजबूत होगी।
