बागेश्वर सत्र न्यायालय द्वारा गरुड़ बैजनाथ मारपीट मामले में सुनाया गया फैसला
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बागेश्वर कोर्ट का बड़ा फैसला: मारपीट और गाली-गलौज के मामले में निचली अदालत का आदेश बरकरार, सत्र न्यायालय ने खारिज की सरकार की अपील! 👇

संवाददाता सीमा खेतवाल

बागेश्वर: उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के अंतर्गत बैजनाथ क्षेत्र के एक बहुचर्चित मारपीट, गाली-गलौज और जान से मारने की धमकी देने के मामले में सत्र न्यायालय ने एक बेहद महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। सत्र न्यायाधीश की अदालत ने निचली अदालत (अवर न्यायालय) द्वारा अभियुक्तों को दोषमुक्त किए जाने के फैसले को पूरी तरह सही ठहराया है। माननीय न्यायालय ने राज्य सरकार द्वारा निचली अदालत के फैसले के खिलाफ दायर की गई फौजदारी अपील को आधारहीन पाते हुए पूरी तरह से निरस्त कर दिया है। अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष अभियुक्तों के खिलाफ आरोपों को युक्तियुक्त संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा है।

क्या था पूरा मामला? (गौशाला और आवारा पशु से शुरू हुआ था विवाद)

मामले के विधिक तथ्यों के अनुसार, यह पूरा विवाद तहसील गरुड़ के एक गांव (कोतवाली बैजनाथ) का है। वादी मुकदमा ने थाना बैजनाथ में एक लिखित तहरीर दर्ज कराई थी। तहरीर में आरोप लगाया गया था कि जून 2024 की शाम करीब 5:40 बजे गांव की ही एक महिला आवारा पशु को उनके गौशाला की तरफ हांकने लगी।

जब वादी और उनकी माता ने इसका विरोध किया, तो आरोपी महिला आग बबूला हो गई और गाली-गलौज व मारपीट करने लगी। आरोप था कि इसी बीच महिला का बेटा भी मौके पर आ गया और दोनों ने मिलकर वृद्ध महिला के साथ डंडे और दराती (हथियार) से गंभीर मारपीट की, जिससे उनके सिर, आंख और हाथ-पैरों में चोटें आईं। जाते-जाते आरोपियों द्वारा जान से मारने की धमकी भी दी गई थी।

पुलिस ने दाखिल की थी चार्जशीट, लेकिन निचली अदालत ने किया था बरी

पीड़ित पक्ष की इस तहरीर के आधार पर थाना बैजनाथ में अभियुक्त मां-बेटे के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 323 (मारपीट), 504 (अपमानित करना) और 506 (जान से मारने की धमकी) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। विवेचना पूरी करने के बाद पुलिस द्वारा न्यायालय में आरोप पत्र (चार्जशीट) दाखिल किया गया था।

हालांकि, इस मामले में सुनवाई करते हुए न्यायिक मजिस्ट्रेट गरुड़ (अवर न्यायालय) ने जनवरी 2026 में दिए अपने निर्णय में दोनों अभियुक्तों को सभी आरोपों से दोषमुक्त (बरी) कर दिया था। निचली अदालत के इसी आदेश के खिलाफ राज्य सरकार ने जिला मजिस्ट्रेट के माध्यम से सत्र न्यायालय बागेश्वर में यह फौजदारी अपील दायर की थी।

सत्र न्यायालय में क्यों टिक नहीं पाया सरकारी पक्ष? (अदालत ने पकड़ी ये 4 बड़ी कमियां)

सत्र न्यायाधीश ने दोनों पक्षों के विद्वान अधिवक्ताओं को विस्तार से सुना और पत्रावली का बारीकी से विधिक अवलोकन किया। न्यायालय ने पाया कि निचली अदालत द्वारा अभियुक्तों को बरी करने के पीछे बेहद ठोस और युक्तिसंगत कारण थे, जिनमें मुख्य रूप से निम्नलिखित विरोधाभास सामने आए:

  1. तहरीर में 2 दिन का भारी विलंब: कथित घटना 26 जून की बताई गई थी, जबकि थाने में तहरीर 28 जून को दी गई। वादी मुकदमा इस 2 दिन के विधिक विलंब का कोई भी तार्किक और स्पष्ट कारण न्यायालय के समक्ष पेश नहीं कर सके। अदालत ने माना कि यह विलंब विधिक राय-मशविरे के बाद तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने की ओर इशारा करता है।

  2. मां और बेटे के बयानों में भयंकर विरोधाभास: वादी ने अदालत में बयान दिया कि आरोपी महिला के हाथ में दराती थी और उसके बेटे ने उसकी माता को पकड़ रखा था। इसके विपरीत, उसकी चोटिल माता ने बयान दिया कि वह आंगन में घूमकर फोन पर बात कर रही थी और महिला ने अचानक दराती से उस पर 100-50 चोटें मार दीं। माता के बयान में आरोपी बेटे द्वारा पकड़े जाने या मारपीट करने का कोई उल्लेख ही नहीं था।

  3. मौखिक गवाही बनाम मेडिकल रिपोर्ट: घायल महिला ने दावा किया कि उन पर दराती से 100-50 वार किए गए। अदालत ने कहा कि यदि दराती से वार होता तो शरीर पर ‘कटा हुआ घाव’ आता। परंतु, चिकित्सक की मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार, चोटें बेहद सामान्य प्रकृति की थीं और किसी ठोस वस्तु पर गिरने के कारण आना पाई गई थीं। इससे साफ हुआ कि घटना को अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया।

  4. पुरानी रंजिश और क्रॉस केस (NCR): प्रतिपरीक्षा में वादी पक्ष ने स्वीकार किया कि उनका अभियुक्तों के साथ पहले से विवाद और पुरानी रंजिश चल रही है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय के सिद्धांतों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि रंजिश एक दो-धारी तलवार है, जो झूठा फंसाने का कारण भी हो सकती है। इसके अलावा, घटना के संबंध में अभियुक्त पक्ष की ओर से भी थाना बैजनाथ में पहले ही एक एनसीआर (NCR) दर्ज कराई गई थी, जिसमें उन्होंने वादी पक्ष पर ही मारपीट का आरोप लगाया था।

माननीय न्यायालय का अंतिम आदेश

सत्र न्यायाधीश बागेश्वर ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय के स्थापित विधिक सिद्धांतों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि अपीलीय न्यायालय को दोषमुक्ति के निर्णय में हस्तक्षेप करते समय अत्यधिक संयम बरतना चाहिए, खासकर तब जब निचली अदालत का निष्कर्ष पूरी तरह युक्तिसंगत हो।

अतः समस्त साक्ष्यों और विधिक परिस्थितियों का मूल्यांकन करते हुए सत्र न्यायालय ने राज्य सरकार की फौजदारी अपील को पूरी तरह से निरस्त कर दिया और न्यायिक मजिस्ट्रेट गरुड़ द्वारा पारित दोषमुक्ति के मूल आदेश की पुष्टि कर दी। न्यायालय ने अवर न्यायालय के रिकॉर्ड को निर्णय की प्रति के साथ वापस भेजने के आदेश जारी कर दिए हैं


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