उत्तराखंड में भ्रष्टाचार के मामलों में घिरे अधिकारियों की आरटीआई रिपोर्ट
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उत्तराखंड RTI खुलासा: राज्य गठन के 26 सालों में सिर्फ एक IAS पर आय से अधिक संपत्ति का केस, भ्रष्टाचार की जांचों पर बड़ा अपडेट

नैनीताल/हल्द्वानी: उत्तराखंड राज्य गठन के बाद से नौकरशाही के गलियारों में भ्रष्टाचार और आय से अधिक संपत्ति के मामलों को लेकर एक चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है। सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मिली रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2000 से अब तक के सफर में केवल एक आईएएस (IAS) अधिकारी के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति (DA) का मुकदमा दर्ज हो पाया है।

RTI से खुला राज: संजीव चतुर्वेदी की मुहिम लाई रंग

यह महत्वपूर्ण ब्यौरा मुख्य वन संरक्षक (हल्द्वानी) और चर्चित आईएफएस अधिकारी संजीव चतुर्वेदी द्वारा मांगी गई जानकारी के बाद सार्वजनिक हुआ है। मुख्य सचिव कार्यालय और कार्मिक विभाग द्वारा दी गई इस जानकारी के लिए मामला राज्य सूचना आयोग तक पहुंचा था, जहां लंबी सुनवाई के बाद अब शासन ने यह डेटा साझा किया है।

प्रमुख मामले: रामबिलास यादव और किशन चंद पर गाज

कार्मिक एवं सतर्कता विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, भ्रष्टाचार के मामलों में दो बड़े नाम प्रमुखता से सामने आए हैं जिनके खिलाफ अभियोजन की अनुमति दी जा चुकी है:

  • रामबिलास यादव (सेवानिवृत्त IAS): इनके खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2016 से 2023 के बीच इनकी घोषित आय मात्र ₹78.51 लाख थी, जबकि खर्च ₹21.40 करोड़ से अधिक पाया गया—जो आय से करीब कई गुना ज्यादा है।

  • किशन चंद (सेवानिवृत्त IFS): इनके विरुद्ध भी भ्रष्टाचार और गंभीर अनियमितताओं के मामले में कार्रवाई को हरी झंडी मिल चुकी है।

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इन अधिकारियों के खिलाफ जांच अभी भी जारी

रिपोर्ट में उन नामों का भी खुलासा हुआ है जिनके खिलाफ सतर्कता विभाग की फाइलें अभी बंद नहीं हुई हैं:

  1. कमेंद्र सिंह: हरिद्वार के पूर्व जिलाधिकारी।

  2. वरुण चौधरी: आईआईएस (IIS) अधिकारी। इन दोनों के खिलाफ चल रही जांचों पर शासन की पैनी नजर है। इसके अलावा, हरिद्वार भूमि घोटाले और अन्य अनियमितताओं में शामिल कुछ अधिकारियों पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने भी मुकदमे दर्ज किए हैं। वहीं, पूर्व आईएफएस अशोक मिश्रा को कोर्ट से दोषमुक्त होने के बाद राहत मिल गई है।

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सतर्कता विभाग की ‘जीरो टॉलरेंस’ पर सवाल?

भले ही सरकार भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’ का दावा करती हो, लेकिन 26 सालों में केवल एक आईएएस पर मुकदमा दर्ज होना सिस्टम की पारदर्शिता पर सवाल खड़े करता है। हालांकि, सतर्कता विभाग का कहना है कि वर्तमान में कई मामलों में साक्ष्य जुटाए जा रहे हैं और दोषियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा।


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