अल्मोड़ा के भैसियाछाना ब्लॉक के तिमूरी गांव के ग्रामीण पगडंडियों के सहारे खतरनाक सफर तय करते हुए
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उत्तराखंड राज्य गठन के 26 साल बाद भी तिमूरी गांव सड़क को तरसा: कषाण बैंड-अगेरा-तिमूरी मार्ग फाइलों में दफन, पगडंडियों के सहारे जान जोखिम में डाल रहे ग्रामीण! 👇

भैसियाछाना/अल्मोड़ा: अलग उत्तराखंड राज्य बने ढाई दशक से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन पहाड़ों के दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति आज भी जस की तस बनी हुई है। इसी की एक बानगी अल्मोड़ा जनपद के विकास खंड भैसियाछाना से सामने आई है। यहाँ की खाकरी ग्राम सभा के अंतर्गत आने वाले तिमूरी गांव को राज्य गठन के बाद आज तक एक अदद पक्की सड़क नसीब नहीं हो सकी है। तत्कालीन सरकार के समय ‘कषाण बैंड से अगेरा-तिमूरी सड़क मार्ग’ को वित्तीय व प्रशासनिक स्वीकृति तो मिल गई थी, लेकिन विडंबना देखिए कि आज तक इस सड़क की फाइल सिर्फ विभागीय दफ्तरों और बाबूगीरी तक ही सीमित रह गई है, जिससे ग्रामीणों का धैर्य अब जवाब देने लगा है।

सड़क के अभाव में आज भी तिमूरी गांव के ग्रामीणों को अपने दैनिक कार्यों और राशन-पानी के लिए मीलों दूर पगडंडियों के पथरीले रास्तों से होकर गुजरना पड़ता है।

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खड़ी चढ़ाई और खतरनाक ढलान का सफर; बरसात में जान जोखिम में डालने की मजबूरी

सड़क न होने के कारण तिमूरी गांव के बुजुर्गों, महिलाओं और स्कूली बच्चों को सबसे ज्यादा दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। ग्रामीणों को पगडंडियों की खड़ी चढ़ाई और खतरनाक ढलान को पार करके अपने निकटतम मार्केट तक पहुंचना पड़ता है।

विशेषकर वर्तमान में जारी बरसात के सीजन में स्थिति और भी ज्यादा भयावह हो जाती है। बारिश के कारण इन संकरे रास्तों और पगडंडियों पर भारी फिसलन और कीचड़ हो जाता है, जिससे हर समय पैर फिसलने और गहरी खाई में गिरने का डर बना रहता है। बीमार मरीजों और गर्भवती महिलाओं को डोली के सहारे मुख्य मार्ग तक पहुंचाना ग्रामीणों के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होता।

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‘वादे आए और चले गए, जमीनी स्तर पर शून्य काम’; गांवों में पलायन की रफ्तार हुई तेज

‘रीठागाड़ी दगड़ियों संघर्ष समिति’ के अध्यक्ष श्री प्रताप सिंह नेगी ने क्षेत्र की इस गंभीर समस्या पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा:

“यह केवल एक तिमूरी गांव की कहानी नहीं है, बल्कि पूरा का पूरा रीठागाड़ क्षेत्र आज सड़क, परिवहन और बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं के कारण बेहद दयनीय स्थिति से गुजर रहा है। उत्तराखंड को अलग राज्य इसलिए बनाया गया था ताकि पहाड़ के गांवों तक विकास पहुंचे। राज्य बनने के बाद से कई सरकारें आईं और गईं, नेताओं ने तिमूरी सहित कई गांवों में सड़क पहुंचाने के बड़े-बड़े वादे किए, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी शून्य है। इसी उपेक्षा और बुनियादी सुविधाओं के अभाव के कारण अब गांव के गांव खाली हो रहे हैं और लोग मजबूरी में तेजी से पलायन (Migration) करने को विवश हैं।”

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स्थानीय निवासियों का कहना है कि यदि सरकार और लोक निर्माण विभाग (PWD) ने जल्द ही कषाण बैंड-अगेरा-तिमूरी सड़क मार्ग की फाइल को दफ्तरों से बाहर निकालकर धरातल पर काम शुरू नहीं किया, तो क्षेत्र की जनता उग्र आंदोलन के लिए बाध्य होगी।


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