Court Scales Of Justice And Legal Document Depicting Acquittal Order In Haldwani Court By Advocate Priyanka Joshiहल्द्वानी न्यायालय परिसर में धोखाधड़ी के मामले में सभी अभियुक्तों को दोषमुक्त करने का आदेश पारित।
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हल्द्वानी (नैनीताल): न्यायालय सिविल जज (जू०डि०) / न्यायिक मजिस्ट्रेट, हल्द्वानी की अदालत ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420, 467, 468 एवं 471 के तहत विचाराधीन फौजदारी वाद में सुनवाई पूरी करते हुए सभी अभियुक्तगण को संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) प्रदान कर बाइज्जत बरी (दोषमुक्त) करने का फैसला सुनाया है। इस बहुचर्चित प्रकरण में अभियुक्त पक्ष की ओर से विद्वान अधिवक्ता श्रीमती प्रियंका जोशी ने मजबूती से पैरवी करते हुए अभियोजन के दावों को अदालत में निष्प्रभावी साबित किया

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अभियोजन कथानक के अनुसार, चालानी थाना लालकुआं द्वारा वादी की लिखित तहरीर के आधार पर यह अभियोग पंजीकृत किया गया था। आरोप लगाया गया था कि एक फर्जी बायो-फर्टिलाइजर कंपनी के नाम पर कृषि फसलों से संबंधित दवाओं, खाद-बीज की डीलरशिप देने, दुकान/गोदाम किराए पर लेने, सैलरी देने तथा सरकारी लाइसेंस बनवाने का प्रलोभन देकर वादी व अन्य पीड़ितों से लाखों रुपये की नकद धनराशि ठग ली गई। इसके साथ ही एक्सपायरी व नकली सामग्री थमाकर कूटरचित कागजातों के इस्तेमाल का आरोप लगाते हुए आरोप-पत्र न्यायालय में प्रेषित किया गया था।

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अभियुक्तों की ओर से पैरवी करते हुए विद्वान अधिवक्ता श्रीमती प्रियंका जोशी ने पत्रावली पर मौजूद मौखिक व दस्तावेजी साक्ष्यों की कमियों को उजागर करते हुए न्यायालय के समक्ष निम्नलिखित महत्वपूर्ण कानूनी दलीलें प्रस्तुत कीं:

  • अभियोजन पक्ष के मुख्य साक्षी व कथित पीड़ित प्रतिपरीक्षा (Cross-Examination) के दौरान अपने पूर्व कथनों से विमुख हो गए और उन्होंने न्यायालय के समक्ष अभियुक्तों से किसी भी प्रकार के लेनदेन, ठगी, धोखाधड़ी या फर्जी दस्तावेज बनाए जाने से स्पष्ट इनकार कर दिया।

  • विद्वान अधिवक्ता श्रीमती प्रियंका जोशी ने रेखांकित किया कि मामले में कोई विधिवत टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (TIP) आयोजित नहीं कराई गई, जिससे यह सिद्ध नहीं हो सका कि मौके पर लेन-देन करने वाले व्यक्ति वास्तव में यही अभियुक्त थे।

  • बचाव पक्ष की ओर से यह प्रमुख तथ्य उठाया गया कि अभियोजन पक्ष कथित फर्जी/कूटरचित मूल दस्तावेज और कथित रूप से बरामद माल मुकदमाती (नकदी, सिम कार्ड, मोबाइल आदि) को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने में पूरी तरह विफल रहा।

  • जब वादी ने स्वयं किसी प्रकार के उत्प्रेरण या छल से इनकार कर दिया है, तो आईपीसी की धारा 420, 467, 468 व 471 के अनिवार्य विधिक तत्व साबित ही नहीं होते।

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न्यायालय ने पत्रावली पर उपलब्ध संपूर्ण साक्ष्यों का परीक्षण करने और विद्वान अधिवक्ता श्रीमती प्रियंका जोशी के तर्कों का संज्ञान लेते हुए माना कि दाण्डिक विधि के सुस्थापित सिद्धांतों के तहत अभियोजन पक्ष अपने मामले को युक्तियुक्त संदेह से परे (Beyond Reasonable Doubt) साबित करने में पूर्णतः असफल रहा है।

साक्षियों के प्रतिकूल बयानों, मूल दस्तावेजों की अनुपस्थिति और अभियुक्तों की पहचान प्रमाणित न होने के आधार पर अदालत ने अभियुक्तगण को सभी आरोपित धाराओं से दोषमुक्त करने का अंतिम निर्णय पारित किया।


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