रामपुर तिराहा कांड
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रामपुर तिराहा कांड: फर्जी हथियार बरामदगी केस; तत्कालीन SHO समेत 3 पुलिसकर्मी दोषी करार, मिली जेल की सजा! 👇

मुजफ्फरनगर/देहरादून: उत्तराखंड राज्य गठन के आंदोलन के इतिहास में सबसे दर्दनाक और संवेदनशील माने जाने वाले ‘रामपुर तिराहा गोलीकांड’ से जुड़े फर्जी हथियार बरामदगी मामले में पूरे 32 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद न्याय की दिशा में एक ऐतिहासिक फैसला आया है। मुजफ्फरनगर की विशेष सीबीआई (CBI) अदालत ने मंगलवार को एक बड़ा फैसला सुनाते हुए उत्तर प्रदेश पुलिस के तत्कालीन छपार थानाध्यक्ष (SHO) बृजकिशोर, कांस्टेबल उमेश चंद और अनिल कुमार को आंदोलनकारियों के खिलाफ झूठे साक्ष्य गढ़ने और साजिश रचने का दोषी पाया है।

विशेष सीबीआई अदालत के पीठासीन अधिकारी डी.के. फौजदार ने तीनों दोषियों को डेढ़-डेढ़ वर्ष (1.5 साल) के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। इसके साथ ही तीनों पर 21-21 हजार रुपये का अर्थदंड (जुर्माना) भी लगाया गया है। इस विधिक फैसले की जानकारी अधिवक्ता अनुराग वर्मा ने मीडिया को साझा करते हुए इसे उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों और न्याय के संघर्ष की एक बहुत बड़ी और महत्वपूर्ण जीत बताया है।

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आंदोलनकारियों को बदनाम करने के लिए रची गई थी ‘फर्जी बरामदगी’ की कहानी

यह पूरा मामला 1-2 अक्टूबर 1994 की उस ऐतिहासिक और काली रात से जुड़ा है, जब अलग उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर हजारों आंदोलनकारी बसों में सवार होकर दिल्ली के राजघाट पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए कूच कर रहे थे। मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा पर तत्कालीन उत्तर प्रदेश पुलिस ने उन्हें रोक दिया, जिसके बाद हुए भारी विवाद में पुलिस ने क्रूरतापूर्वक लाठीचार्ज किया, आंसू गैस के गोले छोड़े और अंधाधुंध फायरिंग की। इस खूनी दमन में कई निर्दोष आंदोलनकारियों की मौत हो गई थी, दर्जनों घायल हुए थे और महिलाओं के साथ दुष्कर्म व छेड़छाड़ के गंभीर आरोप भी सामने आए थे।

इस बर्बर पुलिसिया कार्रवाई के बाद, अपने विधिक बचाव और गोलीकांड को सही ठहराने के लिए तत्कालीन छपार पुलिस ने एक मनगढ़ंत कहानी रची। पुलिस ने दावा किया था कि आंदोलनकारियों के पास से भारी मात्रा में अवैध तमंचे, कारतूस और अन्य घातक हथियार बरामद हुए थे और उन्होंने आत्मरक्षार्थ पुलिस टीम पर फायरिंग की थी। इसी मनगढ़ंत कहानी के आधार पर आंदोलनकारियों के खिलाफ झूठे मुकदमे दर्ज किए गए थे।

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सीबीआई (CBI) जांच में खुली पोल: जब्ती मेमो से लेकर गवाह तक सब थे फर्जी

बाद में जब देशव्यापी जनाक्रोश बढ़ा, तो माननीय इलाहाबाद हाईकोर्ट के कड़े आदेश पर इस पूरे घटनाक्रम की विधिक जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंपी गई। सीबीआई ने जब मामले की परतें खोलीं, तो यूपी पुलिस की पूरी कहानी ताश के पत्तों की तरह ढह गई:

  • झूठे साक्ष्य गढ़े गए: सीबीआई जांच में यह पूरी तरह साबित हुआ कि आंदोलनकारियों से किसी भी तरह के हथियार बरामद नहीं हुए थे। तत्कालीन एसएचओ और कांस्टेबलों ने थाने में बैठकर फर्जी जब्ती मेमो तैयार किया था।

  • दबाव में कराए हस्ताक्षर: जांच एजेंसी ने पाया कि गवाहों को डरा-धमकाकर और सरकारी विधिक दबाव में लेकर झूठे दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कराए गए थे, ताकि अदालत को गुमराह किया जा सके।

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सीबीआई ने इन तीनों पुलिसकर्मियों के खिलाफ सरकारी दस्तावेजों में हेराफेरी, जालसाजी, धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश (Criminal Conspiracy) के तहत चार्जशीट दाखिल की थी। 32 वर्षों तक चली लंबी न्यायिक लड़ाई और गवाहियों के बाद आखिरकार विशेष कोर्ट ने माना कि आंदोलनकारियों को बदनाम करने के लिए यह पूरी विधिक जालसाजी रची गई थी। यह फैसला उत्तराखंड के इतिहास में न्याय की एक नई मिसाल बनकर दर्ज हो गया है।

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