गोल्ड मार्केट एनालिसिस: रिकॉर्ड ऊंचाई से लुढ़का सोना; वैश्विक बाजार में मंदी के बीच भारत में 20% का बंपर रिटर्न, जानें आगे क्या सस्ता होगा गोल्ड?
नई दिल्ली: वैश्विक और घरेलू सर्राफा बाजारों में पिछले काफी समय से सोने की कीमतों (Gold Prices) में लगातार उतार-चढ़ाव का दौर जारी है। इस साल जनवरी के महीने में अपने ऐतिहासिक उच्चतम शिखर को छूने के बाद से सोने के भाव में एक बड़ी गिरावट देखी जा चुकी है। आज यानी सोमवार को भी सोने के भाव में गिरावट दर्ज की गई और यह और नीचे लुढ़क गया। बाजार में आ रही इस लगातार नरमी ने उन लोगों के मन में बड़े सवाल और कशमकश खड़ी कर दी है, जो सोने में नया निवेश करने की योजना बना रहे हैं।
वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (WGC) द्वारा जारी हालिया आंकड़ों के मुताबिक, इस साल मई के महीने में वैश्विक स्तर पर जहां सोने की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई, वहीं भारतीय बाजार में इसके बिल्कुल उलट रुख यानी तेजी देखने को मिली। हालांकि, सोने की कीमतों का पुराना इतिहास गवाह है कि जब भी इसमें कोई जबरदस्त और रिकॉर्ड तोड़ तेजी आती है, तो उसके ठीक बाद बाजार में एक बड़ी गिरावट भी दस्तक देती है। ऐसे में निवेशकों के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या आने वाले समय में भारतीय बाजार में भी सोना काफी सस्ता होने वाला है?
ग्लोबल मार्केट और भारतीय बाजार में कितना है अंतर?
हाल ही में वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (WGC) द्वारा एक विशेष रिपोर्ट जारी की गई है, जिसका शीर्षक ‘गोल्ड मार्केट कमेंट्री: हाइकिंग अप अ वोल्केनो’ है। इस रिपोर्ट के अनुसार:
वैश्विक बाजार का हाल: मई के महीने में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोने के दाम में 1.4 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। मई के अंत में इंटरनेशनल मार्केट में सोना 4,546 डॉलर प्रति औंस के स्तर पर बंद हुआ था।
भारतीय बाजार की स्थिति: वैश्विक मंदी के विपरीत, इसी अवधि के दौरान भारत में सोने की कीमतों में 4.1 प्रतिशत की जोरदार तेजी देखी गई। अगर ओवरऑल रिटर्न की बात करें, तो इस साल अब तक भारतीय घरेलू बाजार में सोने ने अपने निवेशकों को करीब 20 प्रतिशत का बंपर रिटर्न कमा कर दिया है।
दुनिया में मंदी, तो भारत में क्यों बढ़े सोने के दाम?
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब पूरी दुनिया में सोना सस्ता हो रहा था, तब भारत में इसके दाम क्यों आसमान छू रहे थे? दरअसल, भारतीय बाजार में आई इस अप्रत्याशित तेजी की मुख्य वजह पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Tension) और सर्राफा बाजारों में मची भारी उथल-पुथल रही है।
इसी बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी राष्ट्र को संबोधित करते हुए देश के नागरिकों से एक खास अपील की थी। पीएम मोदी ने लोगों से कहा था कि वे फिलहाल कुछ समय के लिए सोने की खरीदारी को टाल दें। प्रधानमंत्री की इस अपील और बाजार में पहले से मौजूद ऊंची कीमतों के संयुक्त असर के कारण भारत, दक्षिण कोरिया और जापान जैसे भौतिक (Physical) बाजारों में सोने की मांग में थोड़ी नरमी देखी गई और कुछ डिस्काउंट भी ऑफर किया गया। इस अपील के बाद, सरकार ने देश के भुगतान संतुलन (Balance of Payments) पर पड़ रहे दबाव को कम करने और सोने के अंधाधुंध आयात (Import) को नियंत्रित करने के लिए इस पर आयात शुल्क (Import Duty) बढ़ा दिया था। सरकार के इसी फैसले का सीधा असर सोने की कीमतों पर पड़ा और घरेलू बाजार में इसके दाम बढ़ गए।
क्या कहता है सोने की कीमतों का इतिहास?
यदि हम पिछले दो दशकों (20 सालों) के मूल्य इतिहास और पुराने ट्रेंड पर नजर डालें, तो एक साफ पैटर्न नजर आता है। इतिहास का इशारा है कि जब भी सोने में कोई बड़ी और रिकॉर्ड तोड़ रैली आती है, तो उसके बाद बाजार में एक बड़ी गिरावट भी देखने को मिलती है:
रिकॉर्ड तोड़ रैली: सितंबर 2022 से शुरू हुई सोने की ऐतिहासिक रैली इसी साल 29 जनवरी को अपने ऑल-टाइम हाई यानी 5,594.82 डॉलर प्रति औंस पर पहुंच गई थी। इस पूरी अवधि के दौरान सोने ने निवेशकों को करीब 245 प्रतिशत का छप्परफाड़ रिटर्न दिया।
शिखर से बड़ी गिरावट: इस ऐतिहासिक शिखर को छूने के बाद से ही सोने की कीमतों में नरमी का रुख बना हुआ है। इंटरनेशनल मार्केट में सोना अपने ऑल-टाइम हाई से करीब 22 प्रतिशत तक टूटकर सोमवार सुबह 4,368 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार कर रहा था।
विशेषज्ञों का अनुमान: इतिहास के पुराने ट्रेंड और पैटर्न को समझें, तो आने वाले महीनों या सालों में सोने की कीमतों में अभी और भी बड़ी गिरावट आ सकती है। जानकारों का मानना है कि इस बड़ी गिरावट के बाद ही सोना एक बार फिर से स्थिरता पाकर बढ़त की राह पर लौटेगा।





