अधिवक्ता रोहन कपकोटी व पंकज बिष्ट
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चेक बाउंस मामले में स्टाफ नर्स को 6 माह की कैद, ₹4.60 लाख का जुर्माना

एडवोकेट रोहन कपकोटी व पंकज बिष्ट की दलीलें रहीं बेहद असरदार! 👇

हल्द्वानी: हल्द्वानी  न्यायालय सिविल जज (जूनियर डिवीजन) / न्यायिक मजिस्ट्रेट ने चेक बाउंस से जुड़े एक फौजदारी मामले में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। अदालत ने पत्रावली पर उपलब्ध सभी साक्ष्यों और विधिक पहलुओं का बारीकी से अनुकरण करते हुए अभियुक्त महिला को दोषी करार दिया है

इस कानूनी लड़ाई में परिवादी पक्ष की ओर से पैरवी कर रहे विद्वान अधिवक्ता रोहन कपकोटी और पंकज बिष्ट की मजबूत व अकाट्य दलीलों के आगे विपक्षी खेमा टिक नहीं सका। इसके परिणामस्वरूप न्यायालय ने अभियुक्ता को कड़ी सजा से दंडित किया है

माता के इलाज के लिए लिया था ₹4.20 लाख का उधार

प्रकरण के संक्षिप्त तथ्यों के अनुसार, हल्द्वानी निवासी परिवादी का छोटी-बड़ी गाड़ियों और खनन का व्यवसाय है। वर्ष 2020 में स्टाफ नर्स के पद पर कार्यरत महिला ने अपनी माता के इलाज के लिए परिवादी से ₹4,20,000/- उधार मांगे थेपारस्परिक जान-पहचान और तात्कालिक परेशानी को देखते हुए परिवादी ने 15 जनवरी 2020 को यह धनराशि अल्मोड़ा टैक्सी स्टैंड पर नकद दी थी। इस दौरान परिवादी का एक दोस्त भी मौके पर मौजूद था

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पर्याप्त धनराशि न होने के कारण बाउंस हो गया चेक

जब परिवादी ने लंबे समय बाद अपनी रकम वापस मांगी, तो टालमटोल करने के बाद अभियुक्ता ने भुगतान के एवज में अपने बैंक खाते का ₹4.20 लाख का एक चेक स्वहस्ताक्षरित कर परिवादी को सौंप दिया। परिवादी ने जब इस चेक को हल्द्वानी स्थित अपने बैंक खाते में भुगतान हेतु लगाया, तो यह चेक “Funds Insufficient” (खाते में पर्याप्त धनराशि न होने) की टिप्पणी के साथ बाउंस होकर वापस आ गया। विधिक नोटिस दिए जाने के बावजूद जब अभियुक्ता द्वारा धनराशि अदा नहीं की गई, तो परिवादी ने अपने अधिवक्ताओं के माध्यम से न्यायालय में फौजदारी परिवाद दर्ज कराया।

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एडवोकेट रोहन कपकोटी और पंकज बिष्ट की विधिक व्यूहरचना

न्यायालय में सुनवाई के दौरान विद्वान अधिवक्ता रोहन कपकोटी और पंकज बिष्ट ने परिवादी का पक्ष अत्यंत मजबूती से रखा। उन्होंने माननीय उच्चतम न्यायालय के विभिन्न ऐतिहासिक दृष्टांतों का हवाला देते हुए न्यायालय के सम्मुख यह स्पष्ट किया कि एन.आई. एक्ट की धारा 118 और 139 के तहत चेक जारी होने और हस्ताक्षर प्रमाणित होने के बाद विधिक उपधारणा परिवादी के पक्ष में स्वतः उत्पन्न होती है। अभियुक्ता पक्ष ने न्यायालय में यह बचाव लेने का प्रयास किया था कि चेक पर उनके हस्ताक्षर नहीं हैं और उन्होंने यह चेक किसी अन्य व्यक्ति को बतौर सिक्योरिटी दिया था। इसके अलावा विपक्ष ने परिवादी की आर्थिक क्षमता और आयकर रिटर्न न लगाने पर भी सवाल उठाए थे।

लेकिन एडवोकेट रोहन कपकोटी और एडवोकेट पंकज बिष्ट की टीम ने अपनी सटीक जिरह और पुख्ता कानूनी तर्कों से विपक्ष के इन दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया। न्यायालय ने भी माना कि अभियुक्ता प्रबलता की संभाव्यता के मानक पर अपना बचाव प्रमाणित करने में पूरी तरह विफल रही है।

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अदालत का अंतिम आदेश: 6 माह की जेल और भारी जुर्माना

सभी गवाहों और दस्तावेजी साक्ष्यों के गहन विश्लेषण के बाद न्यायालय ने माना कि अभियुक्ता के विरुद्ध धारा-138 एन.आई. एक्ट का अभियोग युक्तियुक्त संदेह से परे साबित होता है। न्यायाधीश रवि अरोड़ा की अदालत ने अभियुक्ता को छः माह के साधारण कारावास की सजा सुनाई है। इसके साथ ही अभियुक्ता पर ₹4,60,000/- (चार लाख साठ हजार रुपये) का अर्थदंड लगाया गया है। अर्थदंड की धनराशि अदा न करने पर दोषसिद्ध को दो माह का अतिरिक्त साधारण कारावास भोगना होगा।

अदालत ने आदेश दिया कि इस कुल जुर्माने की राशि में से ₹4,55,000/- परिवादी को प्रतिकर (हर्जाने) के रूप में दिए जाएंगे, जबकि शेष ₹5,000/- राजकीय कोष में जमा होंगे। इसके अलावा, ₹2,00,000/- से अधिक के नगद लेनदेन को देखते हुए अदालत ने माननीय सुप्रीम कोर्ट के गाइडलाइंस के तहत इसकी सूचना आयकर विभाग (Income Tax Department) को भी विधिक जांच हेतु प्रेषित करने के कड़े निर्देश जारी किए हैं।

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