हल्द्वानी न्यायालय परिसर जहां सिविल जज रवि अरोड़ा की अदालत ने धारा 138 के मामले में अभियुक्त को दोषमुक्त किया
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 चेक बाउंस केस में खड़िया कारोबारी दोषमुक्त; अधिवक्ता विनीत परिहार की विधिक दलीलों के आगे ढेर हुआ मुकदमा!

हल्द्वानी (नैनीताल): न्यायालय सिविल जज (जूनियर डिवीजन) / न्यायिक मजिस्ट्रेट हल्द्वानी, रवि अरोड़ा (उत्तराखण्ड न्यायिक सेवा) की अदालत ने चेक बाउंस (धारा 138 परक्राम्य लिखत अधिनियम) से जुड़े एक बहुचर्चित मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। माननीय अदालत ने मामले की विधिक कड़ियों और साक्ष्यों का बारीकी से विश्लेषण करने के बाद अभियुक्त को विधिक रूप से दोषमुक्त (Acquitted) कर दिया है। अदालत ने अपने निर्णय में माना कि शिकायतकर्ता मामले में किसी भी विधिक रूप से प्रवर्तनीय ऋण (Legally Recoverable Debt) के अस्तित्व को कोर्ट के समक्ष साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है।

यह विधिक मामला वर्ष 2020 में कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया गया था। शिकायतकर्ता का आरोप था कि उसने अभियुक्त को उसकी खड़िया खान के नवीनीकरण (रिन्यूवल) हेतु वर्ष 2018 से 2019 के बीच 5 लाख रुपये उधार दिए थे, जिसके एवज में जारी किया गया यूनियन बैंक का चेक बैंक में अपर्याप्त धनराशि के कारण अनादरित (बाउंस) हो गया था।

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विधिक पैरवी: दोनों पक्षों के विद्वान अधिवक्ताओं ने कोर्ट में रखी जोरदार दलीलों की झड़ी

इस हाई-प्रोफाइल विधिक मामले में न्यायालय के समक्ष दोनों पक्षों की ओर से कानून के जानकारों ने बेहद तीखी और विधिक बहस की:

  • परिवादी पक्ष की पैरवी: शिकायतकर्ता की ओर से विधिक पक्ष रखते हुए दलील दी कि अभियुक्त ने वित्तीय तंगी के कारण छल-कपट की मंशा से चेक जारी किया था और विधिक नोटिस मिलने के बाद भी देयता का भुगतान नहीं किया।

  • बचाव पक्ष की पैरवी: वहीं दूसरी ओर, अभियुक्त की ओर से उनके विद्वान अधिवक्ता श्री विनीत परिहार ने अदालत के सामने बेहतरीन विधिक रणनीति और अकाट्य तर्क प्रस्तुत किए। विद्वान अधिवक्ता श्री विनीत परिहार ने शिकायतकर्ता और उनके मुख्य गवाह की प्रतिपरीक्षा (Cross-Examination) के दौरान उनके बयानों में मौजूद गंभीर विधिक अंतर्विरोधों को उजागर कर दिया, जिससे परिवादी का पूरा केस विधिक रूप से कमजोर साबित हो गया।

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इन विधिक कमियों और अंतर्विरोधों के कारण पलटा पूरा केस

माननीय न्यायाधीश रवि अरोड़ा ने अपने विधिक निर्णय में नोट किया कि शिकायतकर्ता के दावों में कई गंभीर विधिक विसंगतियां थीं:

  1. कोई लिखित दस्तावेज या बैंकिंग साक्ष्य नहीं: शिकायतकर्ता ने स्वयं स्वीकार किया कि 5 लाख रुपये जैसी बड़ी धनराशि के लेनदेन के संबंध में उसके पास कोई प्रपत्र, बैंक स्टेटमेंट, फंड ट्रांसफर प्रमाण पत्र या इकरारनामा मौजूद नहीं था और संपूर्ण लेनदेन नकद दिखाया गया था।

  2. आयकर विवरण (ITR) का न होना: शिकायतकर्ता अपनी आर्थिक हैसियत या आय से संबंधित कोई भी विधिक प्रपत्र न्यायालय में दाखिल नहीं कर सका।

  3. बयानों में गंभीर विरोधाभास: शिकायतकर्ता ने केस में कहा कि उसने स्वयं रुपये दिए, जबकि प्रतिपरीक्षा में स्वीकार किया कि उसने स्वयं कभी अभियुक्त को कोई धनराशि नहीं दी, बल्कि यह कथित राशि एक तीसरे व्यक्ति के माध्यम से दी गई थी।

  4. चेक की चोरी और स्टॉप पेमेंट का विधिक सच: अभियुक्त ने अपने विधिक बयान में स्पष्ट किया था कि उसका चेक कार्यालय से खो गया था, जिसकी सूचना उसने 06 अगस्त 2020 को ही बैंक को मेल करके ‘स्टॉप पेमेंट’ (Stop Payment) के लिए दे दी थी।

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इसके अतिरिक्त, विद्वान अधिवक्ता श्री विनीत परिहार ने कोर्ट के समक्ष यह विधिक तथ्य भी रखा कि अभियुक्त के खिलाफ इसी प्रकार के दो अन्य मुकदमे जिला न्यायालय नैनीताल में दायर कराए गए थे, जिनमें माननीय जिला जज नैनीताल द्वारा अपील संख्या 10/2024 एवं 11/2024 में अभियुक्त को पहले ही दोषमुक्त किया जा चुका है।

पहले भी मिल चुकी है विधिक राहत: खड़िया कारोबारी के खिलाफ 10-10 लाख के इसी तरह के दो अन्य मामले भी नैनीताल डीजे कोर्ट (DJ Court) से वर्ष 2025 में खारिज हो चुके हैं,


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