देवभूमि जन हुंकार, नैनीताल / देहरादून: उत्तराखंड के उच्च न्यायालय से विधि जगत और पारिवारिक मामलों को लेकर एक बहुत ही बड़ा, महत्वपूर्ण और कड़ा न्यायिक निर्णय सामने आया है। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने तलाक के एक मामले में देहरादून के पारिवारिक न्यायालय के फैसले को पूरी तरह बरकरार रखते हुए पत्नी की पहली अपील खारिज कर दी है। न्यायालय ने अपने कड़े शब्दों में माना है कि पत्नी का व्यवहार सामान्य वैवाहिक कलह या वैचारिक मतभेद की सीमा से बहुत आगे जाकर मानसिक क्रूरता (Mental Cruelty) की श्रेणी में आता है। खास बात यह है कि इस हाई-प्रोफाइल मामले में पति-पत्नी दोनों ही कानून के पेशे यानी वकालत से जुड़े हैं।
उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश श्री मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति श्री सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने देहरादून के पारिवारिक न्यायालय द्वारा 5 अप्रैल 2024 को पारित तलाक के आदेश को चुनौती देने वाली पत्नी की पहली अपील पर यह विस्तृत फैसला सुनाया।
न्यायिक दस्तावेजों के अनुसार, इस दंपत्ति का विवाह 3 मार्च 2014 को हुआ था और सितंबर 2015 में उनकी पुत्री का जन्म हुआ। इसके बाद अप्रैल 2016 से दोनों अलग-अलग रहने लगे। नवंबर 2016 में पति ने हिंदू विवाह अधिनियम के तहत क्रूरता और परित्याग के आधार पर तलाक की याचिका दायर की थी। पारिवारिक न्यायालय ने वर्ष 2024 में तलाक मंजूर कर लिया था, जिसके खिलाफ पत्नी ने उच्च न्यायालय में अपील की थी।
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पत्नी के उस आचरण पर विशेष रूप से गौर किया जिसमें यह साबित हुआ कि पत्नी ने पति, उसके माता-पिता, रिश्तेदारों, सहकर्मियों और वरिष्ठ अधिकारियों के सामने लगातार गलत और अपमानजनक व्यवहार किया। पति का यह भी आरोप था कि पत्नी उस पर अपनी कॉर्पोरेट वकालत छोड़कर चंडीगढ़ जाने के लिए बार-बार दबाव बनाती थी, उसकी चिकित्सकीय जांच कराने पर जोर देती थी तथा पति व बेटी को उनके दादा-दादी से दूर करने का प्रयास करती थी।
खंडपीठ ने पत्नी की उस दलील को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें यह कहा गया था कि ये आरोप केवल वैचारिक मतभेद और सामान्य वैवाहिक जीवन के छोटे-मोटे विवाद हैं। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सहकर्मियों और परिचितों के सामने बार-बार अपमानित किए जाने से जीवनसाथी की गरिमा और मानसिक स्वास्थ्य पर अत्यंत गंभीर प्रभाव पड़ सकता है, और चूंकि दोनों पक्ष कानूनी पेशे से हैं, इसलिए इस आचरण की गंभीरता और अधिक बढ़ जाती है।
उच्च न्यायालय ने पारिवारिक न्यायालय के तलाक के आदेश को तो बरकरार रखा ही, साथ ही दोनों पक्षों के वित्तीय व भविष्य के हितों को सुरक्षित करते हुए निम्नलिखित कड़े निर्देश दिए:
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बेटी की देखभाल व पढ़ाई: पति को नाबालिग बेटी की देखभाल और उच्च शिक्षा के लिए 70 लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया गया है।
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स्थायी गुजारा-भत्ता: पत्नी को स्थायी गुजारा-भत्ते (Permanent Alimony) के रूप में 40 लाख रुपये देने को कहा गया है।
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इस प्रकार दोनों मदों को मिलाकर कुल 1.10 करोड़ रुपये का वित्तीय भुगतान तय किया गया है।
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कस्टडी व मुलाकात: अदालत ने नाबालिग बेटी की देखभाल व कस्टडी उसकी मां को सौंपी है, साथ ही पिता को बेटी से मिलने के कानूनी अधिकार भी प्रदान किए हैं।
अदालत ने अपने आदेश में यह भी रेखांकित किया कि दोनों पक्ष वर्ष 2016 से लगातार न्यायिक विवाद में हैं और लगभग एक दशक से अलग जीवन बिता रहे हैं। पारिवारिक न्यायालय से लेकर उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) तक आपसी सुलह (Settlement) के अनगिनत प्रयास किए गए, लेकिन वे सभी सफल नहीं हो सके। इन्हीं तमाम विषम परिस्थितियों और साक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के फैसले पर मुहर लगाते हुए पत्नी की अपील खारिज कर दी है।
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