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हल्द्वानी: बुधपार्क में धूमधाम से मनाया गया मई दिवस, मजदूरों ने उठाई अधिकारों की आवाज

हल्द्वानी के बुधपार्क में अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस (1 मई) विभिन्न ट्रेड यूनियनों, सामाजिक व राजनीतिक संगठनों द्वारा संयुक्त रूप से मनाया गया। कार्यक्रम में एक्टू, उत्तराखंड आशा हेल्थ वर्कर्स यूनियन, प्रगतिशील भोजनमाता संगठन, भाकपा माले, जनवादी लोक मंच, भीम आर्मी, किसान महासभा समेत कई संगठनों के प्रतिनिधि और बड़ी संख्या में मजदूर शामिल हुए।

सभा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने नए श्रम कानूनों (लेबर कोड) पर तीखी प्रतिक्रिया जताई। उनका कहना था कि ये कानून मजदूरों के अधिकारों को मजबूत करने के बजाय उन्हें कमजोर कर रहे हैं। आठ घंटे के कार्यदिवस को कमजोर किया जा रहा है और ठेका व गिग इकॉनमी के दौर में मजदूरों का शोषण बढ़ रहा है।

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वक्ताओं ने देश के विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में हो रहे मजदूर आंदोलनों का जिक्र करते हुए कहा कि मजदूर न्यूनतम वेतन और बेहतर कार्य परिस्थितियों की मांग कर रहे हैं, लेकिन उनकी आवाज को दबाने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि आंदोलनों से जुड़े कार्यकर्ताओं पर कार्रवाई कर उन्हें डराया जा रहा है।

सभा में मई दिवस के ऐतिहासिक महत्व को भी याद किया गया। वक्ताओं ने कहा कि 8 घंटे के कार्यदिवस जैसे अधिकार लंबे संघर्ष और कुर्बानियों के बाद हासिल हुए हैं, जिन्हें कमजोर करने की कोशिश हो रही है।

सभा के दौरान मजदूर संगठनों ने अपनी प्रमुख मांगों को भी जोरदार तरीके से उठाया। उन्होंने श्रम-विरोधी लेबर कोड को तत्काल वापस लेने की मांग की, साथ ही गिरफ्तार मजदूरों और ट्रेड यूनियन नेताओं की बिना शर्त रिहाई पर जोर दिया। इसके अलावा न्यूनतम मजदूरी ₹42,000 प्रति माह और ₹1500 प्रतिदिन निर्धारित करने की मांग रखी गई। वक्ताओं ने कहा कि 8 घंटे से अधिक काम कराने पर दोगुना ओवरटाइम दिया जाए और ठेका, संविदा, मानदेय व अन्य अस्थायी कर्मचारियों को स्थायी किया जाए, ताकि मजदूरों को सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन मिल सके।

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कार्यक्रम में मजदूर आंदोलनों के समर्थन और कथित दमन के विरोध में प्रस्ताव भी पारित किए गए। वक्ताओं ने मजदूर, किसान और युवाओं की एकजुटता पर जोर दिया।

इस दौरान के.के. बोरा, बहादुर सिंह जंगी, रजनी जोशी, मनोज पांडे, डॉ. कैलाश पांडेय, रिंकी जोशी, नफीस अहमद खान, पंकज थापा सहित कई वक्ताओं ने अपने विचार रखे। सभा में बड़ी संख्या में श्रमिकों की मौजूदगी रही, जिन्होंने एकजुट होकर अपने अधिकारों की आवाज बुलंद की।

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