नैनीताल, 29 जुलाई 2026 (देवभूमि जन हुंकार विशेष): प्रशासनिक व्यवस्था का मूल उद्देश्य आम जनता की समस्याओं का त्वरित और सरलता से समाधान करना होता है। लेकिन क्या हो जब एक आम नागरिक को अपने छोटे से, सीधे और निर्विवाद काम के लिए जिले के सबसे बड़े अधिकारी, यानी कुमाऊं आयुक्त के दरवाजे खटखटाने पड़ें?
बुधवार को नैनीताल जिले के ग्राम जंतवालगांव की रहने वाली श्रीमती रेवती देवी का मामला इसका जीता-जागता उदाहरण है। यह मामला सिर्फ एक महिला की परेशानी का नहीं है, बल्कि उस सड़े हुए सिस्टम की पोल खोलता है, जहां पटवारी, कानूनगो और तहसीलदार स्तर पर फाइलें तब तक नहीं खिसकतीं, जब तक कि ऊपर से किसी बड़े अधिकारी का डंडा न चले।
एक निर्विवाद मामले में महीनों की देरी क्यों?
श्रीमती रेवती देवी अपने ससुर स्व० गुमान राम की भूमि का विरासतन दाखिल खारिज करवाना चाहती थीं। इस जमीन का उनके अलावा कोई वारिस नहीं था और न ही इस पर किसी की कोई आपत्ति थी। मार्च 2026 में इसके लिए तहसील में बकायदा आवेदन किया गया। कायदे से यह काम पटवारी और कानूनगो की रिपोर्ट लगने के बाद कुछ ही हफ्तों में तहसीलदार स्तर पर खत्म हो जाना चाहिए था।
लेकिन हकीकत यह है कि मार्च से लेकर जुलाई आ गया, पर पोर्टल पर दाखिला नहीं चढ़ा। सवाल यह है कि एक सीधे-सादे मामले में इतनी देरी क्यों? क्या पटवारी या बाबू किसी ‘विशेष आदेश’ या ‘सुविधा शुल्क’ का इंतजार कर रहे थे?
आयुक्त का डंडा चला तो मिनटों में हो गया काम
सिस्टम से हारकर जब रेवती देवी ने कुमाऊं आयुक्त एवं सचिव मुख्यमंत्री दीपक रावत के समक्ष गुहार लगाई, तो आयुक्त ने बिना देर किए तहसीलदार नैनीताल को अपने सामने तलब कर लिया। नतीजा? जो काम पिछले पांच महीनों से फाइलों में धूल फांक रहा था, वह आयुक्त की एक फटकार के बाद चंद मिनटों में पूरा हो गया। तहसीलदार ने हाथों-हाथ दाखिल खारिज दर्ज कर रिपोर्ट भी पेश कर दी।
आयुक्त दीपक रावत की यह त्वरित कार्रवाई निश्चित रूप से काबिले तारीफ है। लेकिन यह पूरी घटना निचले स्तर के अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा और गंभीर सवालिया निशान लगाती है।
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घिस जाती हैं आम आदमी की चप्पलें
नैनीताल जिले (और पूरे उत्तराखंड) में यह कोई पहली घटना नहीं है। खतौनी में नाम चढ़वाना हो, आय या जाति प्रमाण पत्र बनवाना हो, या जमीन की पैमाइश करानी हो—राजस्व विभाग (Revenue Department) में आम आदमी को ऐसे दौड़ाया जाता है कि उसकी चप्पलें घिस जाती हैं।
पटवारी कभी हलके (क्षेत्र) में नहीं मिलते, कानूनगो के पास फाइलों का अंबार है, और तहसील कार्यालयों में आम आदमी की सुनवाई भगवान भरोसे है। “पटवारी जी आज मीटिंग में हैं,” “कानूनगो साहब दौरे पर हैं,” या “सर्वर डाउन है”—ये वो बहाने हैं जो तहसील के चक्कर काटने वाले हर ग्रामीण को रटे हुए हैं।
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तो फिर पटवारी, कानूनगो और तहसीलदार की जिम्मेदारी क्या है?
अगर एक निर्विवाद दाखिल खारिज के लिए भी प्रदेश के कुमाऊं आयुक्त को हस्तक्षेप करना पड़े, तो फिर हलका पटवारी, रजिस्ट्रार कानूनगो, नायब तहसीलदार और तहसीलदार की फौज किसलिए बैठा रखी है?
मुख्यमंत्री और शासन बार-बार ‘सरलीकरण, समाधान, निस्तारण’ और ‘सुशासन’ का नारा देते हैं। लेकिन जब तक धरातल पर बैठे कर्मचारी अपनी जिम्मेदारी को नहीं समझेंगे, तब तक सुशासन का सपना अधूरा ही रहेगा। हर पीड़ित व्यक्ति कुमाऊं आयुक्त या मुख्यमंत्री तक नहीं पहुंच सकता। कई लोग तो सरकारी दफ्तरों के रवैये से तंग आकर अपने जायज हक को ही छोड़ देते हैं।
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जवाबदेही तय करने का वक्त आ गया है
कुमाऊं आयुक्त दीपक रावत ने पीड़ित को न्याय तो दिला दिया, लेकिन अब समय आ गया है कि इस लेटलतीफी के लिए जिम्मेदारी भी तय की जाए।
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मार्च से लेकर जुलाई तक फाइल किस मेज पर अटकी रही?
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किस कर्मचारी या अधिकारी की लापरवाही से एक बुजुर्ग महिला को महीनों तक मानसिक रूप से परेशान होना पड़ा?
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क्या ऐसे लापरवाह कर्मचारियों पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए?
जब तक निचले स्तर के अधिकारियों और कर्मचारियों में काम न करने या बेवजह फाइल अटकाने का डर पैदा नहीं होगा, तब तक तहसील परिसरों में आम आदमी की चप्पलें यूं ही घिसती रहेंगी।
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