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Uttarakhand Legal Concept Representing ACJM Court Judgment and Check Bounce Acquittal in Nainital
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वरिष्ठ अधिवक्ता श्री गोविन्द सिंह डंगवाल, अधिवक्ता, सहायक अधिवक्ता साथी योगेंद्र कुमार पाठक, कोमल जायसवाल और लक्ष्मण सिंह जीना की दमदार पैरवी ने दिलाई बड़ी कानूनी जीत; चेक बाउंस के ₹5 लाख के मामले में दावा ध्वस्त

उत्तराखंड की विधिक व्यवस्था में बैंकिंग और वाणिज्यिक विवादों से जुड़ा एक बेहद महत्वपूर्ण, तार्किक और नजीर बनने वाला कानूनी फैसला सामने आया है। परक्राम्य लिखित अधिनियम (Negotiable Instruments Act – NI Act) की धारा 138 के तहत चल रहे एक बहुचर्चित फौजदारी परिवाद में विद्वान अधिवक्ता गोविन्द सिंह डंगवाल, सहायक अधिवक्ता साथी योगेंद्र कुमार पाठक, कोमल जायसवाल और लक्ष्मण सिंह जीना की अचूक विधिक रणनीति, सूक्ष्म साक्ष्य विश्लेषण और प्रभावी बहस के चलते विपक्षी पक्षकार के आरोपों को अदालत ने पूरी तरह खारिज कर दिया।

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अधिवक्ता गोविन्द सिंह डंगवाल, सहायक अधिवक्ता साथी योगेंद्र कुमार पाठक, कोमल जायसवाल और लक्ष्मण सिंह जीना की विधिक रणनीति बनी जीत की कुंजी

इस पूरे मुकदमे में वरिष्ठ अधिवक्ता गोविन्द सिंह डंगवाल, सहायक अधिवक्ता साथी योगेंद्र कुमार पाठक, कोमल जायसवाल और लक्ष्मण सिंह जीना ने बचाव पक्ष की ओर से पैरवी की कमान संभालते हुए परिवादी के दावों की कमजोर कड़ियों को कानून की कसौटी पर परखा। अधिवक्ताओं ने न्यायालय के समक्ष अकाट्य तर्क और दस्तावेजी साक्ष्य पेश करते हुए स्पष्ट किया कि:

  1. सुरक्षा चेक का दुरुपयोग साबित किया: अधिवक्ताओं ने साबित किया कि दोनों पक्षों के मध्य 28 जून 2022 को एक विधिवत इकरारनामा हुआ था, जिसके तहत विवादित चेक केवल गारंटी/सिक्योरिटी (सुरक्षा) के तौर पर दिया गया था, न कि किसी तात्कालिक देनदारी के लिए।
  2. ऑनलाइन भुगतान का अकाट्य रिकॉर्ड: अधिवक्ता द्वारा अदालत के समक्ष यह स्पष्ट तथ्य स्थापित किया कि कथित ₹5 लाख की राशि में से ₹3,20,000/- (तीन लाख बीस हजार रुपये) की बड़ी रकम ऑनलाइन माध्यम से पहले ही लौटाई जा चुकी थी।
  3. गवाहों की जिरह (Cross-Examination) में सच्चाई कराई उजागर: अधिवक्ता द्वारा की गई तीखी और तार्किक प्रतिपरीक्षा में परिवादी और उसके मुख्य गवाह को यह स्वीकार करना पड़ा कि इकरारनामा अस्तित्व में था और ₹3,20,000/- की राशि वास्तव में प्राप्त हो चुकी थी।

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सुप्रीम कोर्ट की नजीर और धारा 56 का विधिक प्रहार

अधिवक्ता ने माननीय उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले दशरथभाई त्रिकमभाई पटेल बनाम हितेश महेंद्रभाई पटेल (2023) का हवाला देते हुए कानून के मूल सिद्धांत को अदालत के समक्ष मजबूती से रखा:

  • अधिवक्ताओं ने दलील दी कि धारा 56 एन०आई० एक्ट के तहत यदि किसी चेक की आंशिक राशि पहले ही प्राप्त हो चुकी हो, तो परिवादी का विधिक दायित्व है कि वह प्राप्त राशि को चेक के पीछे पृष्ठांकित (Endorse) करे।
  • आंशिक भुगतान मिल जाने के बाद भी पूरे ₹5,00,000/- के मूल चेक को बैंक में लगाना कानूनन अवैध है, जिससे विधिक रूप से प्रवर्तनीय ऋण (Legally Enforceable Debt) का आधार ही समाप्त हो जाता है।

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अदालत का अंतिम निष्कर्ष

अदालत ने अधिवक्ता की दलीलों, भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 58 (स्वीकार किए गए तथ्य) और सुप्रीम कोर्ट की विधि व्यवस्था को पूरी तरह स्वीकार किया।

अदालत ने अपने फैसले में माना कि परिवादी कानूनी देनदारी साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है। परिणामस्वरूप, धारा 138 एन०आई० एक्ट के तहत लगाए गए समस्त आरोपों को निरस्त करते हुए मामले को समाप्त कर दिया गया तथा पूर्व में दाखिल व्यक्तिगत बंधपत्र व जमानतनामे भी रद्द कर दिए गए।

विधिक विशेषज्ञों के अनुसार, चेक बाउंस मामलों में धारा 56 और आंशिक अदायगी के विधिक पहलुओं को जिस सटीकता से अधिवक्ता गोविन्द सिंह डंगवाल, सहायक अधिवक्ता साथी योगेंद्र कुमार पाठक, कोमल जायसवाल और लक्ष्मण सिंह जीना ने अदालत में प्रस्तुत किया, वह कानून के जानकारों और ऐसे मामलों का सामना कर रहे लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण नजीर बन गया है।

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By admin