उत्तराखंड शिक्षा विभाग में ‘दिव्यांग कोटे’ का बड़ा फर्जीवाड़ा: 1995 के सर्टिफिकेट पर चल रही थी नौकरी!
ऋषिकेश/देहरादून: उत्तराखंड शिक्षा विभाग में दिव्यांग कोटे के नाम पर हुए कथित फर्जीवाड़े की परतें अब खुलने लगी हैं। हाईकोर्ट के कड़े रुख के बाद राज्य मेडिकल बोर्ड और ऋषिकेश AIIMS में हुई जांच ने शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जांच में अब तक 36 शिक्षकों के प्रमाण-पत्र फर्जी या संदिग्ध पाए गए हैं, जिससे पूरे महकमे में हड़कंप मच गया है।
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AIIMS की जांच में हुआ चौंकाने वाला खुलासा
हाईकोर्ट के आदेश पर कुल 794 शिक्षकों और कर्मचारियों को जांच के दायरे में रखा गया था। इनमें से अब तक 587 शिक्षक ही मेडिकल बोर्ड के सामने पेश हुए हैं। ऋषिकेश AIIMS में जब इन शिक्षकों की शारीरिक जांच हुई, तो ऐसे मामले सामने आए जिन्होंने अधिकारियों के होश उड़ा दिए:
29 साल पुराना सर्टिफिकेट: चमोली के एक शिक्षक ने 1995 के अस्थि विकार प्रमाण-पत्र के आधार पर नौकरी हासिल कर रखी थी, जिसकी प्रामाणिकता अब सवालों के घेरे में है।
एक्सपायर्ड प्रमाणपत्र: कई शिक्षक ऐसे मिले जिनके दिव्यांग प्रमाण-पत्रों की वैधता 2020 में ही समाप्त हो चुकी थी, लेकिन वे उसी पुराने कागज के सहारे नौकरी कर रहे थे।
मानक से कम दिव्यांगता: सरकारी नियम के अनुसार, कोटे का लाभ लेने के लिए न्यूनतम 40% दिव्यांगता अनिवार्य है, लेकिन जांच में कई शिक्षकों की दिव्यांगता मात्र 30% ही पाई गई।
बेटे की जगह पिता को लाभ: हद तो तब हो गई जब दो मामलों में दिव्यांग बेटा था, लेकिन कोटे का लाभ लेते हुए पिता का नाम सूची में दर्ज करा दिया गया।
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11 मई को अंतिम मौका, अनुपस्थित रहने पर होगी कार्रवाई
जो शिक्षक पिछली जांच में शामिल नहीं हो पाए थे, उन्हें 11 मई को दोबारा ऋषिकेश AIIMS में मेडिकल बोर्ड के सामने पेश होने का अंतिम अवसर दिया गया है। माध्यमिक शिक्षा विभाग के अपर निदेशक परमेंद्र कुमार बिष्ट ने स्पष्ट किया है कि सभी मुख्य शिक्षा अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे संबंधित शिक्षकों को तत्काल सूचित करें।
इस जांच से यह साफ हो गया है कि विभाग में वर्षों से दिव्यांगों के हक पर डाका डाला जा रहा था। अब देखना यह होगा कि इन 36 संदिग्ध शिक्षकों और इस खेल में शामिल अधिकारियों पर सरकार क्या कानूनी कार्रवाई करती है।





